दिन Poetry (page 85)

ईद का दिन है सो कमरे में पड़ा हूँ 'असलम'

असलम कोलसरी

हमारी जीत हुई है कि दोनों हारे हैं

असलम कोलसरी

यार को दीदा-ए-ख़ूँ-बार से ओझल कर के

असलम कोलसरी

हमारी जीत हुई है कि दोनों हारे हैं

असलम कोलसरी

दयार-ए-हिज्र में ख़ुद को तो अक्सर भूल जाता हूँ

असलम कोलसरी

कट गईं सारी पतंगें डोर से

असलम हबीब

ज़द पे आ जाएगा जो कोई तो मर जाएगा

असलम फ़र्रुख़ी

दोस्तों के साथ दिन में बैठ कर हँसता रहा

असलम आज़ाद

यादों का लम्स ज़ेहन को छू कर गुज़र गया

असलम आज़ाद

जगमगाती ख़्वाहिशों का नूर फैला रात भर

असलम आज़ाद

इक बर्ग बर्ग दिन की ख़बर चाहिए मुझे

असलम अंसारी

बुझी है आतिश-ए-रंग-ए-बहार आहिस्ता आहिस्ता

असलम अंसारी

किस के मातम में रो रही है रात

आसिमा ताहिर

तुम इस रस्ते में क्यूँ बारूद बोए जा रहे हो

आसिम वास्ती

बना रखा है मंसूबा कई बरसों का तू ने

आसिम वास्ती

तुम भटक जाओ तो कुछ ज़ौक़-ए-सफ़र आ जाएगा

आसिम वास्ती

सामने रह कर न होना मसअला मेरा भी है

आसिम वास्ती

अगर चुभती हुई बातों से डरना पड़ गया तो

आसिम वास्ती

नामा तिरा मैं ले कर मुँह देख रह गया था

आसिफ़ुद्दौला

मर गया ग़म में तिरे हाए में रोता रोता

आसिफ़ुद्दौला

जिस घड़ी तेरे आस्ताँ से गए

आसिफ़ुद्दौला

जिस दिन से यार मुझ से वो शोख़ आश्ना हुआ

आसिफ़ुद्दौला

जब से मेरे दिल में आ कर इश्क़ का थाना हुआ

आसिफ़ुद्दौला

ग़ैर पर लुत्फ़ करे हम पे सितम या क़िस्मत

आसिफ़ुद्दौला

आता है तेग़ हाथ में वो जंग-जू लिए

आसिफ़ुद्दौला

आँखों से अपनी 'आसिफ़' तू एहतिराज़ करना

आसिफ़ुद्दौला

ये मो'जिज़ा भी किसी रोज़ कर ही जाना है

अासिफ़ शफ़ी

राह-ए-जुनूँ पे चल परे जीना मुहाल कर लिया

अासिफ़ शफ़ी

जमाल-ए-यार को तस्वीर करने वाले थे

अासिफ़ शफ़ी

झंकार है मौजों की बहते हुए पानी से

अासिफ़ साक़िब

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