दिन Poetry (page 87)

गर्म-ए-तलाश-ओ-जुस्तुजू अब है तिरी नज़र कहाँ

असग़र गोंडवी

झपकी ज़रा जो आँख जवानी गुज़र गई

असर लखनवी

बहार है तिरे आरिज़ से लौ लगाए हुए

असर लखनवी

जो लोग डरते हैं रातों को अपने साए से

असर अकबराबादी

कोई हमदम बना के देखो तुम

असर अकबराबादी

जाने क्यूँ लोग ग़म से डरते हैं

असर अकबराबादी

हम-साई

असद जाफ़री

शश्दर-ओ-हैरान है जो भी ख़रीदारों में है

असद जाफ़री

दो-जहाँ से मावरा हो जाएगा

असद भोपाली

तल्ख़ियाँ

असअ'द बदायुनी

जो लोग रातों को जागते थे

असअ'द बदायुनी

उस अब्र से भी क़बाहत ज़ियादा होती है

असअ'द बदायुनी

तलब की राहों में सारे आलम नए नए से

असअ'द बदायुनी

मौसम-ए-हिज्र तो दाइम है न रुख़्सत होगा

असअ'द बदायुनी

अजब दिन थे कि इन आँखों में कोई ख़्वाब रहता था

असअ'द बदायुनी

अज़ल के दिन जिन्हें देखा था बज़्म-ए-हुस्न-ए-पिन्हाँ में

आरज़ू सहारनपुरी

अपनी अपनी गर्दिश-ए-रफ़्तार पूरी कर तो लें

आरज़ू लखनवी

मिरी निगाह कहाँ दीद-ए-हुस्न-ए-यार कहाँ

आरज़ू लखनवी

कुछ दिन की रौनक़ बरसों का जीना

आरज़ू लखनवी

ख़ाली बैठे क्यूँ दिन काटें आओ रे जी इक काम करें

आरज़ू लखनवी

जिन रातों में नींद उड़ जाती है क्या क़हर की रातें होती हैं

आरज़ू लखनवी

हैं देस-बिदेस एक गुज़र और बसर में

आरज़ू लखनवी

आँख से दिल में आने वाला

आरज़ू लखनवी

आँख उन से मिरी मिली थी कभी

अरुण कुमार आर्य

वीराँ वीराँ बाम-ओ-दर मैं और मिरी तन्हाई

अरशदुल क़ादरी

ग़ुरूब-ए-शाम तो दिन भर के फ़ासले पर है

अरशद मलिक

लहू के साथ तबीअत में सनसनाती फिरे

अरशद मलिक

मोहब्बत सिर्फ़ इक जज़्बा नहीं है

अरशद लतीफ़

किसी सूरत अगर इज़हार की सूरत निकल आए

अरशद लतीफ़

ख़दशा

अरशद कमाल

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