दिन Poetry (page 88)

कहाँ कहाँ से सुनाऊँ तुम्हें फ़साना-ए-शब

अरशद जमाल 'सारिम'

बे-अमाँ हूँ इन दिनों मैं दर-ब-दर फिरता हूँ मैं

अरशद जमाल 'सारिम'

हुआ मैं रिंद-मशरब ख़ाक मर कर इस तमन्ना में

अरशद अली ख़ान क़लक़

ऐ बे-ख़ुदी-ए-दिल मुझे ये भी ख़बर नहीं

अरशद अली ख़ान क़लक़

था क़स्द-ए-क़त्ल-ए-ग़ैर मगर मैं तलब हुआ

अरशद अली ख़ान क़लक़

तासीर जज़्ब मस्तों की हर हर ग़ज़ल में है

अरशद अली ख़ान क़लक़

परतव-ए-रुख़ का तिरे दिल में गुज़र रहता है

अरशद अली ख़ान क़लक़

नहीं चमके ये हँसने में तुम्हारे दाँत अंजुम से

अरशद अली ख़ान क़लक़

मिलता है क़ैद-ए-ग़म में भी लुत्फ़-ए-फ़ज़ा-ए-बाग़

अरशद अली ख़ान क़लक़

जुनूँ बरसाए पत्थर आसमाँ ने मज़रा-ए-जाँ पर

अरशद अली ख़ान क़लक़

जो साक़िया तू ने पी के हम को दिया है जाम-ए-शराब आधा

अरशद अली ख़ान क़लक़

हम ने एहसान असीरी का न बर्बाद किया

अरशद अली ख़ान क़लक़

गुलों पर साफ़ धोका हो गया रंगीं कटोरी का

अरशद अली ख़ान क़लक़

डोरा नहीं है सुरमे का चश्म-ए-सियाह में

अरशद अली ख़ान क़लक़

बशर के फ़ैज़-ए-सोहबत से लियाक़त आ ही जाती है

अरशद अली ख़ान क़लक़

बाक़ी न हुज्जत इक दम-ए-इसबात रह गई

अरशद अली ख़ान क़लक़

अदा से देख लो जाता रहे गिला दिल का

अरशद अली ख़ान क़लक़

इश्क़ मरहून-ए-हिकायात-ओ-गुमाँ भी होगा

अरशद अब्दुल हमीद

चिराग़-ए-दर्द कि शम-ए-तरब पुकारती है

अरशद अब्दुल हमीद

वो सहरा जिस में कट जाते हैं दिन याद-ए-बहाराँ से

अर्श मलसियानी

मैं क्यूँ भूल जाऊँ

अर्श मलसियानी

15 अगस्त (1949)

अर्श मलसियानी

ये दुनिया है उसे दार-उल-फ़ितन कहना ही पड़ता है

अर्श मलसियानी

तू अगर दिल में एक बार आए

अर्श मलसियानी

ताज-ए-ज़र्रीं न कोई मसनद-ए-शाही माँगूँ

अरमान नज्मी

जो गुम-गश्ता है उस की ज़ात क्या है

अरमान नज्मी

गुज़रते दिन के दुखों का पता तो देता था

अरमान नज्मी

घनी आबादियों की बे-अमानी का तमाशा कर

अरमान नज्मी

दिमाग़-ओ-दिल पे हो क्या असर अँधेरे का

अरमान नज्मी

ये दिन

आरिफ़ा शहज़ाद

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