दिन Poetry (page 90)

ख़्वाब बिखरेंगे तो हम को भी बिखरना होगा

अनवर मीनाई

हर दम दुआ-ए-आब-ओ-हवा माँगते रहे

अनवर मीनाई

अगले दिन कुछ ऐसे होंगे

अनवर मसूद

अब कहाँ और किसी चीज़ की जा रक्खी है

अनवर मसूद

कहाँ तक दूर रह पाऊँगा ख़ुद से

अनवर ख़ान

हवा के साथ उड़ जाएगा पानी

अनवर ख़ान

कोई पूछेगा जिस दिन वाक़ई ये ज़िंदगी क्या है

अनवर जलालपुरी

क़याम-गाह न कोई न कोई घर मेरा

अनवर जलालपुरी

पराया कौन है और कौन अपना सब भुला देंगे

अनवर जलालपुरी

दर्द उरूज पर आ जाए तो

अनवार फ़ितरत

अश्क बेताब व निगह बे-बाक व चश्म-ए-तर ख़राब

अनवर देहलवी

कब लज़्ज़तों ने ज़ेहन का पीछा नहीं किया

अनवर अंजुम

हुआ करे अगर उस को कोई गिला होगा

अनवर अंजुम

हुआ करे अगर उस को कोई गिला होगा

अनवर अंजुम

धूप हो गए साए जल गए शजर जैसे

अनवर अंजुम

हमें भूला नहीं अफ़्साना दिल का

अनवर मोअज़्ज़म

आओ देखें अहल-ए-वफ़ा की होती है तौक़ीर कहाँ

अनवर मोअज़्ज़म

दिल यही सोच के बेताब हुआ जाता है

अनुभव गुप्ता

जिस दिन शहर जला था उस दिन धूप में कितनी तेज़ी थी

अंजुम तराज़ी

लम्हा लम्हा अपनी ज़हरीली बातों से डसता था

अंजुम तराज़ी

वो इक दिन जाने किस को याद कर के

अंजुम सलीमी

उठाए फिरता रहा मैं बहुत मोहब्बत को

अंजुम सलीमी

माँ की दुआ न बाप की शफ़क़त का साया है

अंजुम सलीमी

एक दिन मेरी ख़ामुशी ने मुझे

अंजुम सलीमी

सोला दिसम्बर

अंजुम सलीमी

मैं तुम्हारे लिए ले के आया हूँ

अंजुम सलीमी

उसे छूते हुए भी डर रहा था

अंजुम सलीमी

सहर को खोज चराग़ों पे इंहिसार न कर

अंजुम सलीमी

ख़ुद अपने हाथ से क्या क्या हुआ नहीं मिरे साथ

अंजुम सलीमी

कैसी सोहबत है कैसी तन्हाई

अंजुम सलीमी

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