दिन Poetry (page 89)

कैसा मातम कैसा रोना मिट्टी का

आरिफ़ शफ़ीक़

हमें नज़दीक कब दिल की मोहब्बत खींच लाती है

आरिफ़ शफ़ीक़

उम्र-भर का हुआ ज़ियाँ जानाँ

आरिफ़ इशतियाक़

मुझ को फ़ुर्क़त से गुज़ारा जाएगा

आरिफ़ इशतियाक़

दिया जलाएगी तू और मैं बुझाऊँगा

आरिफ़ इशतियाक़

हालत-ए-हर्फ़ किस ने जानी है

आरिफ़ इमाम

वो कारवान-ए-बहाराँ कि बे-दरा होगा

आरिफ़ अब्दुल मतीन

मोहब्बत रही चार दिन ज़िंदगी में

अनवर शऊर

कड़ा है दिन बड़ी है रात जब से तुम नहीं आए

अनवर शऊर

हो गए दिन जिन्हें भुलाए हुए

अनवर शऊर

ज़हर की चुटकी ही मिल जाए बराए दर्द-ए-दिल

अनवर शऊर

यादों के बाग़ से वो हरा-पन नहीं गया

अनवर शऊर

रही रात उन से मुलाक़ात कम

अनवर शऊर

कुछ दिन तो कर तआ'वुन ऐ ख़ुश-सिफ़ात मुझ से

अनवर शऊर

ख़त्म हर अच्छा बुरा हो जाएगा

अनवर शऊर

कट चुकी थी ये नज़र सब से बहुत दिन पहले

अनवर शऊर

कड़ा है दिन बड़ी है रात जब से तुम नहीं आए

अनवर शऊर

जो सुनता हूँ कहूँगा मैं जो कहता हूँ सुनूँगा मैं

अनवर शऊर

इस में क्या शक है कि आवारा हूँ मैं

अनवर शऊर

हो गए दिन जिन्हें भुलाए हुए

अनवर शऊर

बशारत हो कि अब मुझ सा कोई पागल न आएगा

अनवर शऊर

अकेले क्या पस-ए-दीवार-ओ-दर गए हम तुम

अनवर शऊर

लेकिन

अनवर सेन रॉय

क्या होना मुमकिन है

अनवर सेन रॉय

ख़्वाबों को समझौते रास नहीं आते

अनवर सेन रॉय

जब फ़स्ल-ए-बहाराँ आती है शादाब गुलिस्ताँ होते हैं

अनवर सहारनपुरी

आबाद अब न होगा मय-ख़ाना ज़िंदगी का

अनवर सहारनपुरी

तू भी कर ग़ौर इस कहानी पर

अनवर सदीद

अपने दिल की आदत है शहज़ादों वाली

अनवर सदीद

न तन्हा नस्तरीन ओ नस्तरन से इश्क़ है मुझ को

अनवर साबरी

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