दिन Poetry (page 76)

अब रहा क्या है जो अब आए हैं आने वाले

बिस्मिल अज़ीमाबादी

जो न करना था किया जो कुछ न होना था हुआ

बिस्मिल इलाहाबादी

आज़ार-ओ-जफ़ा-ए-पैहम से उल्फ़त में जिन्हें आराम नहीं

बिस्मिल इलाहाबादी

सब उम्र तो जारी नहीं रहता है सफ़र भी

बिस्मिल आग़ाई

क्या रौशनी-ए-हुस्न-ए-सबीह अंजुमन में है

बिशन नरायण दराबर

ज़ब्त-ए-नाला दिल-ए-फ़िगार न कर

बिर्ज लाल रअना

ऐसा हुआ कि घर से न निकला तमाम दिन

बिमल कृष्ण अश्क

वो: एक

बिमल कृष्ण अश्क

एआद-ए-हिकायतें

बिमल कृष्ण अश्क

तुझ जैसा इक आँचल चाहूँ अपने जैसा दामन ढूँडूँ

बिमल कृष्ण अश्क

जब चौदहवीं का चाँद निकलता दिखाई दे

बिमल कृष्ण अश्क

ऐसे में रोज़ रोज़ कोई ढूँडता मुझे

बिमल कृष्ण अश्क

करूँ क्या सख़्त मुश्किल आ पड़ी है

बिल्क़ीस ख़ान

सोते में मुस्कुराते बच्चे को देख कर

बिलाल अहमद

नास्टैल्जिया

बिलाल अहमद

एक ख़्वाब

बिलाल अहमद

दीवार-ए-काबा 19 नवम्बर 1989

बिलाल अहमद

शफ़क़ से बाम-ए-फ़लक लाला-गूँ भी होता है

बिलाल अहमद

जाम-ए-गदाई हाथ में ले नित सांज-सवेरे फिरते हैं

भूरे ख़ान आशुफ़्ता

सितारे हार चुकी थी सभी जुआरी रात

भवेश दिलशाद

कहाँ पहुँचेगा वो कहना ज़रा मुश्किल सा लगता है

भवेश दिलशाद

ये चार दिन के तमाशे हैं आह दुनिया के

भारतेंदु हरिश्चंद्र

रुख़-ए-रौशन पे उस की गेसू-ए-शब-गूँ लटकते हैं

भारतेंदु हरिश्चंद्र

ग़ाफ़िल इतना हुस्न पे ग़र्रा ध्यान किधर है तौबा कर

भारतेंदु हरिश्चंद्र

रहे न एक भी बेदाद-गर सितम बाक़ी

भारतेंदु हरिश्चंद्र

ख़याल-ए-नावक-ए-मिज़्गाँ में बस हम सर पटकते हैं

भारतेंदु हरिश्चंद्र

बाल बिखेरे आज परी तुर्बत पर मेरे आएगी

भारतेंदु हरिश्चंद्र

आ गई सर पर क़ज़ा लो सारा सामाँ रह गया

भारतेंदु हरिश्चंद्र

उम्मीदों से पर्दा रक्खा ख़ुशियों से महरूम रहीं

भारत भूषण पन्त

घर से निकल कर जाता हूँ मैं रोज़ कहाँ

भारत भूषण पन्त

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