दिन Poetry (page 74)

इश्क़ ही इश्क़ हो आशिक़ हो न माशूक़ जहाँ

दत्तात्रिया कैफ़ी

फ़िदा अल्लाह की ख़िल्क़त पे जिस का जिस्म ओ जाँ होगा

दत्तात्रिया कैफ़ी

ढूँढने से यूँ तो इस दुनिया में क्या मिलता नहीं

दत्तात्रिया कैफ़ी

क्या वहीं मिलोगे तुम

दर्शिका वसानी

तुझी को जो याँ जल्वा-फ़रमा न देखा

ख़्वाजा मीर 'दर्द'

रब्त है नाज़-ए-बुताँ को तो मिरी जान के साथ

ख़्वाजा मीर 'दर्द'

अगर यूँ ही ये दिल सताता रहेगा

ख़्वाजा मीर 'दर्द'

अगर यूँ ही ये दिल सताता रहेगा

ख़्वाजा मीर 'दर्द'

कोई सिवा-ए-बदन है न है वरा-ए-बदन

दानियाल तरीर

मुस्कुरा कर उन का मिलना और बिछड़ना रूठ कर

दानिश अलीगढ़ी

क्या ख़बर थी मुन्हरिफ़ अहल-ए-जहाँ हो जाएँगे

दानिश अलीगढ़ी

एक दिन नक़्श-ए-क़दम पर मिरे बन जाएगी राह

दामोदर ठाकुर ज़की

उन के मिलने का ब-ज़ाहिर तो यक़ीं कोई नहीं

दामोदर ठाकुर ज़की

वो दिन गए कि 'दाग़' थी हर दम बुतों की याद

दाग़ देहलवी

उन की फ़रमाइश नई दिन रात है

दाग़ देहलवी

तबीअ'त कोई दिन में भर जाएगी

दाग़ देहलवी

लिपट जाते हैं वो बिजली के डर से

दाग़ देहलवी

कल तक तो आश्ना थे मगर आज ग़ैर हो

दाग़ देहलवी

दिल में समा गई हैं क़यामत की शोख़ियाँ

दाग़ देहलवी

सब लोग जिधर वो हैं उधर देख रहे हैं

दाग़ देहलवी

क़रीने से अजब आरास्ता क़ातिल की महफ़िल है

दाग़ देहलवी

फिरे राह से वो यहाँ आते आते

दाग़ देहलवी

खुलता नहीं है राज़ हमारे बयान से

दाग़ देहलवी

जो हो सकता है उस से वो किसी से हो नहीं सकता

दाग़ देहलवी

जब वो बुत हम-कलाम होता है

दाग़ देहलवी

इस क़दर नाज़ है क्यूँ आप को यकताई का

दाग़ देहलवी

हुआ जब सामना उस ख़ूब-रू से

दाग़ देहलवी

हाथ निकले अपने दोनों काम के

दाग़ देहलवी

फ़लक देता है जिन को ऐश उन को ग़म भी होते हैं

दाग़ देहलवी

दिल चुरा कर नज़र चुराई है

दाग़ देहलवी

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