दुनिया Poetry (page 94)

दूसरों का दर्द 'अख़्तर' मेरे दिल का दर्द है

अख़्तर अंसारी

अपनी उजड़ी हुई दुनिया की कहानी हूँ मैं

अख़्तर अंसारी

पुर-कैफ़ ज़ियाएँ होती हैं पुर-नूर उजाले होते हैं

अख़्तर अंसारी

क्या ख़बर थी इक बला-ए-ना-गहानी आएगी

अख़्तर अंसारी

जाँ-सिपारी के भी अरमाँ ज़िंदगी की आस भी

अख़्तर अंसारी

हयात इंसाँ की सर ता पा ज़बाँ मालूम होती है

अख़्तर अंसारी

अपनी उजड़ी हुई दुनिया की कहानी हूँ मैं

अख़्तर अंसारी

अपनी बहार पे हँसने वालो कितने चमन ख़ाशाक हुए

अख़्तर अंसारी

आफ़तों में घिर गया हूँ ज़ीस्त से बे-ज़ार हूँ

अख़्तर अंसारी

फ़ौजियों के सर तो दुश्मन के सिपाही ले गए

अख़लाक़ बन्दवी

मक़्तल

अख़लाक़ अहमद आहन

ये तिरे लम्स का एहसास जवाँ-तर हो जाए

अख़लाक़ अहमद आहन

लफ़्ज़ों के सितम लहजों के आज़ार बहुत हैं

अख़लाक़ आतिफ़

ख़ुद नज़ारों पे नज़ारों को हँसी आती है

अख़गर मुशताक़ रहीमाबादी

नींद में गुनगुना रहा हूँ मैं

अकबर मासूम

न अपना नाम न चेहरा बदल के आया हूँ

अकबर मासूम

अब भी अक्सर ध्यान तुम्हारा आता है

अकबर मासूम

मुश्किल ही से कर लेती है दुनिया उसे क़ुबूल

अकबर हैदराबादी

हिम्मत वाले पल में बदल देते हैं दुनिया को

अकबर हैदराबादी

छोड़ के माल-ओ-दौलत सारी दुनिया में अपनी

अकबर हैदराबादी

सायों से भी डर जाते हैं कैसे कैसे लोग

अकबर हैदराबादी

जिन पे अजल तारी थी उन को ज़िंदा करता है

अकबर हैदराबादी

जिन के नसीब में आब-ओ-दाना कम कम होता है

अकबर हैदराबादी

बस इक तसलसुल-ए-तकरार-ए-क़ुर्ब-ओ-दूरी था

अकबर हैदराबादी

हू-ब-हू आप ही की मूरत है

अकबर हमीदी

गई गुज़री कहानी लग रही है

अकबर हमीदी

क्या कहूँ जज़्बात का तूफ़ान कितना तेज़ है

अकबर हैदरी

आह ऐ सौदा-ए-ख़ाम-ए-आरज़ू

अकबर हैदरी

दुनिया में हूँ दुनिया का तलबगार नहीं हूँ

अकबर इलाहाबादी

नई तहज़ीब

अकबर इलाहाबादी

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