शोक Poetry (page 17)

ऐ दिल-ए-ख़ुद-ना-शनास ऐसा भी क्या

उम्मीद फ़ाज़ली

मिरी भँवों के ऐन दरमियान बन गया

उमैर नजमी

बड़े तहम्मुल से रफ़्ता रफ़्ता निकालना है

उमैर नजमी

इश्क़ में हर तमन्ना-ए-क़ल्ब-ए-हज़ीं सुर्ख़ आँसू बहाए तो मैं क्या करूँ

तुर्फ़ा क़ुरैशी

फूल होंटों को ग़ज़ल-ख़्वाँ देखना

तुफ़ैल बिस्मिल

मुस्कुराएगा मगर बात नहीं मानेगा

तुफ़ैल अहमद मदनी

दिन में सूरज है मिरी महरूमियों का तर्जुमाँ

तिश्ना बरेलवी

दाम-ए-ग़म-ए-हयात में उलझा गई उमीद

तिलोकचंद महरूम

ख़ाक-ए-हिंद

तिलोकचंद महरूम

ये किस से आज बरहम हो गई है

तिलोकचंद महरूम

वो दिल कहाँ है अहल-ए-नज़र दिल कहें जिसे

तिलोकचंद महरूम

वो आई शाम-ए-ग़म वक़्फ़-ए-बला होने का वक़्त आया

तिलोकचंद महरूम

शहर से एक तरफ़ दूर बहुत

तिलोकचंद महरूम

किसी की याद को हम ज़ीस्त का हासिल समझते हैं

तिलोकचंद महरूम

ख़िज़ाँ से पेशतर सारा चमन बर्बाद होता है

तिलोकचंद महरूम

इस का गिला नहीं कि दुआ बे-असर गई

तिलोकचंद महरूम

दस्त-ए-ख़िरद से पर्दा-कुशाई न हो सकी

तिलोकचंद महरूम

कौन से दुख को पल्ले बाँधें किस ग़म को तहरीर करें

तौसीफ़ तबस्सुम

वाहिमा होगा यहाँ कोई न आया होगा

तौसीफ़ तबस्सुम

मेरी सूरत साया-ए-दीवार-ओ-दर में कौन है

तौसीफ़ तबस्सुम

मेरी सूरत साया-ए-दीवार-ओ-दर में कौन है

तौसीफ़ तबस्सुम

मरते मरते रौशनी का ख़्वाब तो पूरा हुआ

तौसीफ़ तबस्सुम

क्या बताऊँ कि है किस ज़ुल्फ़ का सौदा मुझ को

तौसीफ़ तबस्सुम

कितने ही तीर ख़म-ए-दस्त-ओ-कमाँ में होंगे

तौसीफ़ तबस्सुम

गर्द-आलूद दरीदा चेहरा यूँ है माह ओ साल के ब'अद

तौसीफ़ तबस्सुम

बजा कि दरपय-ए-आज़ार चश्म-ए-तर है बहुत

तौसीफ़ तबस्सुम

आइना मिलता तो शायद नज़र आते ख़ुद को

तौसीफ़ तबस्सुम

हिज्र था बार-ए-अमानत की तरह

तौक़ीर तक़ी

याद और ग़म की रिवायात से निकला हुआ है

तौक़ीर तक़ी

ख़ाक होती हुई हस्ती से उठा

तौक़ीर तक़ी

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