शोक Poetry (page 97)

दुनिया-ए-हुस्न-ओ-इश्क़ में किस का ज़ुहूर था

फ़ानी बदायुनी

दिल की काया ग़म ने वो पल्टी कि तुझ सा बन गया

फ़ानी बदायुनी

दिल और दिल में याद किसी ख़ुश-ख़िराम की

फ़ानी बदायुनी

दैर में या हरम में गुज़रेगी

फ़ानी बदायुनी

बे-ज़ौक़-ए-नज़र बज़्म-ए-तमाशा न रहेगी

फ़ानी बदायुनी

बे-ख़ुदी पे था 'फ़ानी' कुछ न इख़्तियार अपना

फ़ानी बदायुनी

बेदाद के ख़ूगर थे फ़रियाद तो क्या करते

फ़ानी बदायुनी

बे-अजल काम न अपना किसी उनवाँ निकला

फ़ानी बदायुनी

ऐ मौत तुझ पे उम्र-ए-अबद का मदार है

फ़ानी बदायुनी

ऐ अजल ऐ जान-ए-'फ़ानी' तू ने ये क्या कर दिया

फ़ानी बदायुनी

आँख उठाई ही थी कि खाई चोट

फ़ानी बदायुनी

आह से या आह की तासीर से

फ़ानी बदायुनी

क़ैद-ए-ग़म-ए-हयात भी क्या चीज़ है 'फ़ना'

फ़ना निज़ामी कानपुरी

ग़म से नाज़ुक ज़ब्त-ए-ग़म की बात है

फ़ना निज़ामी कानपुरी

यूँ तिरी तलाश में तेरे ख़स्ता-जाँ चले

फ़ना निज़ामी कानपुरी

यूँ इंतिक़ाम तुझ से फ़स्ल-ए-बहार लेंगे

फ़ना निज़ामी कानपुरी

या रब मिरी हयात से ग़म का असर न जाए

फ़ना निज़ामी कानपुरी

वो ख़ानुमाँ-ख़राब न क्यूँ दर-ब-दर फिरे

फ़ना निज़ामी कानपुरी

तू फूल की मानिंद न शबनम की तरह आ

फ़ना निज़ामी कानपुरी

मुझे रुतबा-ए-ग़म बताना पड़ेगा

फ़ना निज़ामी कानपुरी

मेरे चेहरे से ग़म आश्कारा नहीं

फ़ना निज़ामी कानपुरी

जब मेरे रास्ते में कोई मय-कदा पड़ा

फ़ना निज़ामी कानपुरी

घर हुआ गुलशन हुआ सहरा हुआ

फ़ना निज़ामी कानपुरी

ये तमन्ना है कि इस तरह मुसलमाँ होता

फ़ना बुलंदशहरी

वो और होंगे जिन को हरम की तलाश है

फ़ना बुलंदशहरी

तुम हो शरीक-ए-ग़म तो मुझे कोई ग़म नहीं

फ़ना बुलंदशहरी

तिरा ग़म रहे सलामत यही मेरी ज़िंदगी है

फ़ना बुलंदशहरी

मुझ को दुनिया के हर इक ग़म से छुड़ा रक्खा है

फ़ना बुलंदशहरी

मिरी लौ लगी है तुझ से ग़म-ए-ज़िंदगी मिटा दे

फ़ना बुलंदशहरी

किस को सुनाऊँ हाल-ए-ग़म कोई ग़म-आश्ना नहीं

फ़ना बुलंदशहरी

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