घर Poetry (page 106)

अब इस से पहले कि दुनिया से मैं गुज़र जाऊँ

अशोक साहिल

मेरे एहसास मेरे विसवास

अशोक लाल

घर वापसी

अशोक लाल

सर्द-मेहरी से तिरी दिल जो तपाँ रखते हैं

अश्क रामपुरी

हंगाम-ए-शब-ओ-रोज़ में उलझा हुआ क्यूँ हूँ

अशफ़ाक़ हुसैन

दिल अजनबी देस में लगा है

अशफ़ाक़ हुसैन

मैं ने भी परछाइयों के शहर की फिर राह ली

अशअर नजमी

सुकूत-ए-शब के हाथों सोंप कर वापस बुलाता है

अशअर नजमी

रफ़्ता रफ़्ता ख़त्म क़िस्सा हो गया होना ही था

अशअर नजमी

है कौन जिस से कि वादा ख़ता नहीं होता

अशहर हाशमी

तिरे महल में हज़ारों चराग़ जलते हैं

असग़र वेलोरी

एक फ़ित्ना सा उठाया है चला जाएगा

असग़र वेलोरी

कहाँ सर छुपाएँ पता ही नहीं

असग़र शमीम

कहाँ खो गए मेरे ग़म-ख़्वार अब

असग़र शमीम

इक शख़्स अपने हाथ की तहरीर दे गया

असग़र राही

अपने घर में मिरी तस्वीर सजाने वाले

असग़र राही

सफ़र से लौट आने वाली हवा

असग़र नदीम सय्यद

धूप-भरी अजरक

असग़र नदीम सय्यद

अपनी रात लय जाओ

असग़र नदीम सय्यद

दीवार उन के घर की मिरी धूप ले गई

असग़र मेहदी होश

फूल पत्थर की चटानों पे खिलाएँ हम भी

असग़र मेहदी होश

काम कुछ तो लेना था अपने दीदा-ए-तर से

असग़र मेहदी होश

जला जला के दिए पास पास रखते हैं

असग़र मेहदी होश

चेहरों को बे-नक़ाब समझने लगा था मैं

असग़र मेहदी होश

बस्ती मिली मकान मिले बाम-ओ-दर मिले

असग़र मेहदी होश

बाहर का माहौल तो हम को अक्सर अच्छा लगता है

असग़र मेहदी होश

बचपन तमाम बूढ़े सवालों में कट गया

असग़र मेहदी होश

आए थे घर में आग लगाने शरीर लोग

असग़र मेहदी होश

हम दश्त से हर शाम यही सोच के घर आए

असग़र गोरखपुरी

है दिल-ए-नाकाम-ए-आशिक़ में तुम्हारी याद भी

असग़र गोंडवी

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