घर Poetry (page 105)

ज़द पे आ जाएगा जो कोई तो मर जाएगा

असलम फ़र्रुख़ी

हंगामा-ए-हस्ती से गुज़र क्यूँ नहीं जाते

असलम फ़र्रुख़ी

कोशिश है गर उस की कि परेशान करेगा

असलम इमादी

दीवारों को दिल से बाहर रखने वाले

असलम बदर

अपना मकान भी था उसी मोड़ पर मगर

असलम आज़ाद

यादों का लम्स ज़ेहन को छू कर गुज़र गया

असलम आज़ाद

लरज़ लरज़ के दिल-ए-ना-तवाँ ठहर ही न जाए

असलम अंसारी

पौ फटते ही ट्रेन की सीटी जब कानों में गूँजती है

आसिमा ताहिर

तेज़ इतना ही अगर चलना है तन्हा जाओ तुम

आसिम वास्ती

नहीं वो शम-ए-मोहब्बत रही तो फिर 'आसिम'

आसिम वास्ती

तुम भटक जाओ तो कुछ ज़ौक़-ए-सफ़र आ जाएगा

आसिम वास्ती

सामने रह कर न होना मसअला मेरा भी है

आसिम वास्ती

है मुस्तक़िल यही एहसास कुछ कमी सी है

आसिम वास्ती

दामन-ए-गुल में कहीं ख़ार छुपा देखते हैं

आसिम वास्ती

ये न आने के बहाने हैं सभी वर्ना मियाँ

आसिफ़ुद्दौला

वहशत में सू-ए-दश्त जो ये आह ले गई

आसिफ़ुद्दौला

मिलने को तुझ से दिल तो मिरा बे-क़रार है

आसिफ़ुद्दौला

किस क़दर दर्द के शब करता था मज़कूर तिरा

आसिफ़ुद्दौला

जिस दम तिरे कूचे से हम आन निकलते हैं

आसिफ़ुद्दौला

अपना घर बाज़ार में क्यूँ रख दिया

अासिफ़ा निशात

और अब ये दिल भी मेरा मानता है

अासिफ़ शफ़ी

झंकार है मौजों की बहते हुए पानी से

अासिफ़ साक़िब

बारिश कैसी जादूगर है

अासिफ़ साक़िब

सहरा से भी वीराँ मिरा घर है कि नहीं है

अासिफ़ जमाल

साए की तरह कोई मिरे साथ लगा था

अासिफ़ जमाल

कैसी आशुफ़्तगी-ए-सर है यहाँ

अासिफ़ जमाल

उन से मिला तो फिर मैं किसी का नहीं रहा

अशरफ़ शाद

बसीत-ए-दश्त की हुर्मत को बाम-ओ-दर दे दे

अशरफ़ जावेद

बसीत-ए-दश्त की हुर्मत को बाम-ओ-दर दे दे

अशरफ़ जावेद

ऐ तजल्ली क्या हुआ शेवा तिरी तकरार का

अशरफ़ अली फ़ुग़ाँ

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