घर Poetry (page 107)

हुस्न-ए-बेपर्दा की गर्मी से कलेजा पक्का

असीर लखनवी

हम-साई

असद जाफ़री

सिर्फ़ कहने को कोई अज़्मत-निशाँ बनता नहीं

असद जाफ़री

रवाँ है क़ाफ़िला-ए-जुस्तुजू किधर मेरा

असद जाफ़री

मलाल-ए-हिज्र नहीं रंज-ए-बे-रुख़ी भी नहीं

असद जाफ़री

जब तक वो शो'ला-रू मिरे पेश-ए-नज़र न था

असद जाफ़री

पुराने घर की शिकस्ता छतों से उकता कर

असअ'द बदायुनी

यही नहीं कि मिरा घर बदलता जाता है

असअ'द बदायुनी

उस अब्र से भी क़बाहत ज़ियादा होती है

असअ'द बदायुनी

सुख़न-वरी का बहाना बनाता रहता हूँ

असअ'द बदायुनी

वाए ग़ुर्बत कि हुए जिस के लिए ख़ाना-ख़राब

आरज़ू लखनवी

मुझे रहने को वो मिला है घर कि जो आफ़तों की है रहगुज़र

आरज़ू लखनवी

वो क्या लिखता जिसे इंकार करते भी हिजाब आया

आरज़ू लखनवी

तड़पते दिल को न ले इज़्तिराब लेता जा

आरज़ू लखनवी

पियूँ ही क्यूँ जो बुरा जानूँ और छुपा के पियूँ

आरज़ू लखनवी

जिन रातों में नींद उड़ जाती है क्या क़हर की रातें होती हैं

आरज़ू लखनवी

हर साँस है इक नग़्मा हर नग़्मा है मस्ताना

आरज़ू लखनवी

हैं देस-बिदेस एक गुज़र और बसर में

आरज़ू लखनवी

बग़ौर देख रहा है अदा-शनास मुझे

आरज़ू लखनवी

वीराँ वीराँ बाम-ओ-दर मैं और मिरी तन्हाई

अरशदुल क़ादरी

तुम्हारे जम्परों पर साड़ियों पर और ग़रारों पर

अरशद मीर

किसी सूरत अगर इज़हार की सूरत निकल आए

अरशद लतीफ़

समुंदर से किसी लम्हे भी तुग़्यानी नहीं जाती

अरशद कमाल

सच की ख़ातिर सब कुछ खोया कौन लिखेगा

अरशद कमाल

जीना है एक शग़्ल सो करते रहे हैं हम

अरशद काकवी

हम तो न घर में आप के दम-भर ठहरने आएँ

अरशद अली ख़ान क़लक़

वा'दा-ख़िलाफ़ कितने हैं ऐ रश्क-ए-माह आप

अरशद अली ख़ान क़लक़

परतव-ए-रुख़ का तिरे दिल में गुज़र रहता है

अरशद अली ख़ान क़लक़

नहीं चमके ये हँसने में तुम्हारे दाँत अंजुम से

अरशद अली ख़ान क़लक़

न वो ख़ुशबू है गुलों में न ख़लिश ख़ारों में

अरशद अली ख़ान क़लक़

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