घर Poetry (page 52)

दिल के कहने पर चल निकला

सदा अम्बालवी

ठहरे भी नहीं हैं कहीं चलते भी नहीं हैं

सचिन शालिनी

कैसे सच से रहे बे-ख़बर आइना

सचिन शालिनी

न इंतिज़ार करो इन का ऐ अज़ा-दारो

साबिर ज़फ़र

मैं सोचता हूँ मुझे इंतिज़ार किस का है

साबिर ज़फ़र

कहती है ये शाम की नर्म हवा फिर महकेगी इस घर की फ़ज़ा

साबिर ज़फ़र

तन्हाई तामीर करेगी घर से बेहतर इक ज़िंदान

साबिर ज़फ़र

निगाह करने में लगता है क्या ज़माना कोई

साबिर ज़फ़र

नए कपड़े बदल और बाल बना तिरे चाहने वाले और भी हैं

साबिर ज़फ़र

कोई तो तर्क-ए-मरासिम पे वास्ता रह जाए

साबिर ज़फ़र

जिधर हो ज़िंदगी मुश्किल उधर नहीं आते

साबिर ज़फ़र

हर एक मरहला-ए-दर्द से गुज़र भी गया

साबिर ज़फ़र

दरीचा बे-सदा कोई नहीं है

साबिर ज़फ़र

ये महर ओ मह बे-चराग़ ऐसे कि राख बन कर बिखर रहे हैं

साबिर वसीम

ख़्वाब तुम्हारे आते हैं

साबिर वसीम

इक शोर समेटो जीवन भर और चुप दरिया में उतर जाओ

साबिर वसीम

इक सफ़र पर उसे भेज कर आ गए

साबिर वसीम

इक आग देखता था और जल रहा था मैं

साबिर वसीम

देखो ऐसा अजब मुसाफ़िर फिर कब लौट के आता है

साबिर वसीम

इक बरहमन ने कहा है कि ये साल अच्छा है

साबिर दत्त

आज की रात

साबिर दत्त

तिलिस्म टूट गया शब का मैं भी घर को चलूँ

साबिर अदीब

तुझे तलाश है जिस की गुज़र गया कब का

साबिर अदीब

कैसी मअनी की क़बा रिश्तों को पहनाई गई

साबिर अदीब

दिल में आ जा दिलबर साईं

सबीहा सबा, पाकिस्तान

एक मशवरा

सबा इकराम

ज़िंदगानी हँस के तय अपना सफ़र कर जाएगी

सबा इकराम

इन पत्थरों के शहर में दिल का गुज़र कहाँ

सबा इकराम

आवाज़ के पत्थर जो कभी घर में गिरे हैं

सबा इकराम

अच्छा हुआ कि सब दर-ओ-दीवार गिर पड़े

सबा अकबराबादी

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