घर Poetry (page 55)

फिर वही कुंज-ए-क़फ़स है वही सय्याद का घर

रिन्द लखनवी

फिर वही कुंज-ए-क़फ़स है वही सय्याद का घर

रिन्द लखनवी

किसी का कोई मर जाए हमारे घर में मातम है

रिन्द लखनवी

ज़माने में वो मह-लक़ा एक है

रिन्द लखनवी

सातों फ़लक किए तह-ओ-बाला निकल गया

रिन्द लखनवी

मुँह न ढाँको अब तो सूरत देख ली

रिन्द लखनवी

मुझे दे के दिल जान खोना पड़ा है

रिन्द लखनवी

क्यूँ-कर न लाए रंग गुलिस्ताँ नए नए

रिन्द लखनवी

दिल-लगी ग़ैरों से बे-जा है मिरी जाँ छोड़ दे

रिन्द लखनवी

दिल किस से लगाऊँ कहीं दिलबर नहीं मिलता

रिन्द लखनवी

दीद-ए-गुलज़ार-ए-जहाँ क्यूँ न करें सैर तो है

रिन्द लखनवी

छुप के घर ग़ैर के जाया न करो

रिन्द लखनवी

अल्लाह के भी घर से है कू-ए-बुताँ अज़ीज़

रिन्द लखनवी

आज इंकार न फ़रमाइए आप

रिन्द लखनवी

जो रिवायात भूल जाते हैं

रिफ़अत सुलतान

नक़ाब-ए-रुख़ उठा कर हुस्न जब जल्वा-फ़िगन होगा

रिफ़अत सेठी

शहर-ए-शोर-ओ-शर तन्हा घर के बाम-ओ-दर तन्हा

रिफ़अत सरोश

जब याद आया तेरा महकता बदन मुझे

रिफ़अत अल हुसैनी

इक घर बना के कितने झमेलों में फँस गए

रियाज़ मजीद

रात दिन महबूस अपने ज़ाहिरी पैकर में हूँ

रियाज़ मजीद

मुसाफ़िरत के तहय्युर से कट के कब आए

रियाज़ मजीद

मासूम ख़्वाहिशों की पशीमानियों में था

रियाज़ मजीद

मकान-ए-दिल से जो उठता था वो धुआँ भी गया

रियाज़ मजीद

ख़ुद में झाँका तो अजब मंज़र नज़र आया मुझे

रियाज़ मजीद

दर्द ग़ज़ल में ढलने से कतराता है

रियाज़ मजीद

छुपे हुए थे जो नक़्द-ए-शुऊ'र के डर से

रियाज़ मजीद

बदल सका न जुदाई के ग़म उठा कर भी

रियाज़ मजीद

ख़ुदा से उसे माँग कर देखते हैं

रेनू नय्यर

ख़ुदा से उसे माँग कर देखते हैं

रेनू नय्यर

अब के मिले तो हम दोनों ही

रेनू नय्यर

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