घर Poetry (page 57)

हर एक घर का दरीचा खुला है मेरे लिए

रज़ा हमदानी

न काबा है यहाँ मेरे न है बुत-ख़ाना पहलू में

रज़ा अज़ीमाबादी

इस चश्म ओ दिल ने कहना न माना तमाम उम्र

रज़ा अज़ीमाबादी

यार को बेबाकी में अपना सा हम ने कर लिया

रज़ा अज़ीमाबादी

उस घड़ी कुछ थे और अब कुछ हो

रज़ा अज़ीमाबादी

टुक तू महमिल का निशाँ दे जल्द ऐ सूरत ज़रा

रज़ा अज़ीमाबादी

सच कह 'रज़ा' ये किस से लगाई है साट-बाट

रज़ा अज़ीमाबादी

निकल मत घर से तू ऐ ख़ाना-आबाद

रज़ा अज़ीमाबादी

इश्क़ की बीमारी है जिन को दिल ही दिल में गलते हैं

रज़ा अज़ीमाबादी

हर नफ़स मूरिद-ए-सफ़र हैं हम

रज़ा अज़ीमाबादी

बुतों को फ़ाएदा क्या है जो हम से जंग करते हैं

रज़ा अज़ीमाबादी

दिल में झाँका तो बहुत ज़ख़्म पुराने निकले

रज़ा अमरोही

दौर-ए-सबूही शोला-ए-मीना रक़्साँ छाँव में तारों की

रविश सिद्दीक़ी

पर्बत टीले बंद मकानों जैसे थे

रवी कुमार

धुँद में लिपटे हुए मंज़र बहुत अच्छे लगे

रवी कुमार

न बुतों के न अब ख़ुदा के रहे

रौनक़ टोंकवी

क्या देखते हैं आप झिजक कर शराब में

रौनक़ टोंकवी

ठोकरों की शय परस्तिश की नज़र तक ले गए

रौनक़ रज़ा

न जाने कब से मैं गर्द-ए-सफ़र की क़ैद में था

रौनक़ रज़ा

देख उफ़ुक़ के पीले-पन में दूर वो मंज़र डूब गया

रौनक़ रज़ा

अँधेरी खाई से गोया सफ़र चटान का था

रौनक़ रज़ा

दरवाज़ा मायूस है शायद सोग में है अँगनाई बहुत

रौनक़ नईम

जो भी कुछ अच्छा बुरा होना है जल्दी हो जाए

रउफ़ रज़ा

हर मौसम में ख़ाली-पन की मजबूरी हो जाओगे

रउफ़ रज़ा

बहुत ख़ूबियाँ हैं हवस-कार दिल में

रउफ़ रज़ा

सिलसिले ये कैसे हैं टूट कर नहीं मिलते

रउफ़ ख़लिश

शर्तों पे अपनी खेलने वाले तो हैं वही

रऊफ़ ख़ैर

पत्ते तमाम हल्क़ा-ए-सरसर में रह गए

रऊफ़ ख़ैर

गिरफ़्तारी के सब हरबे शिकारी ले के निकला है

रऊफ़ ख़ैर

दिल दुख न जाए बात कोई बे-सबब न पूछ

रऊफ़ ख़ैर

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