घर Poetry (page 58)

ख़्वाब ही में रुख़-ए-पुर-नूर दिखाए कोई

रतन पंडोरवी

शौक़ से आए बुरा वक़्त अगर आता है

रसूल साक़ी

घर से निकल के आए हैं बाज़ार के लिए

रसूल साक़ी

किसी दराज़ में रखना कि ताक़ पर रखना

रासिख़ इरफ़ानी

जवाँ रुतों में लगाए हुए शजर अपने

रासिख़ इरफ़ानी

गर्म हर लम्हा लहू जिस्म के अंदर रखना

रासिख़ इरफ़ानी

दोस्त के शहर में जब मैं पहुँचा शहर का मंज़र अच्छा था

रासिख़ फारानी

रौशनी बन के अँधेरे पे असर हम ने किया

राशिद तराज़

ये जो मेरे अंदर फैली ख़ामोशी है

राशिद क़य्यूम अनसर

महफ़िल में तो बस वो सज रहा है

राशिद मुफ़्ती

लाख मुझे दोश पे सर चाहिए

राशिद मुफ़्ती

हाथ से छू कर ये नीला आसमाँ भी देखते

राशिद मुफ़्ती

भले ही मिरा हौसला पस्त होता

राशिद मुफ़्ती

फूल सोए हुए थे छाती पर

रशीद इमकान

इक घना सा शजर मिरे बाज़ू

रशीद इमकान

कोई साया न शजर याद आया

राशिद हामिदी

तड़प उठता हूँ यादों से लिपट कर शाम होते ही

राशिद अनवर राशिद

क़याम रूह में कर ध्यान से उतर के न जा

राशिद अनवर राशिद

मुंजमिद आख़िर है क्यूँ ता-हद्द-ए-मंज़र फैल जा

राशिद अनवर राशिद

तेरी मेहंदी में मिरे ख़ूँ की महक आ जाए

राशिद अमीन

शायद

राशिद आज़र

साया

राशिद आज़र

ये बे-नवाई हमारी सौदा-ए-सर है घर में बसा दिया है

राशिद आज़र

हुस्न हो इश्क़ का ख़ूगर मुझे रहने देते

राशिद आज़र

चाहत तुम्हारी सीने पे क्या गुल कतर गई

राशिद आज़र

बाज़ भी आओ याद आने से

राशिद आज़र

आइने से मुकर गया कोई

राशिद आज़र

अगरचे मैं ने लिखीं उस को अर्ज़ियाँ भी बहुत

रशीद उस्मानी

उन के घर आना नहीं जाना नहीं

रशीद रामपुरी

मिरे घर के लोग जो घर मुझी को सुपुर्द कर के चले गए

रशीद रामपुरी

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