घर Poetry (page 59)

किस को लहद और मर्ग का डर हो

रशीद रामपुरी

दिल की क्या क़द्र हो मेहमाँ कभी आए न गए

रशीद रामपुरी

दिल की बे-इख़्तियारियाँ न गईं

रशीद रामपुरी

माना वो एक ख़्वाब था धोका नज़र का था

रशीद क़ैसरानी

कुछ साए से हर लहज़ा किसी सम्त रवाँ हैं

रशीद क़ैसरानी

कुछ साए से हर लहज़ा किसी सम्त रवाँ हैं

रशीद क़ैसरानी

ठहर जावेद के अरमाँ दिल-ए-मुज़्तर निकलते हैं

रशीद लखनवी

शराब-ए-नाब का क़तरा जो साग़र से निकल जाए

रशीद लखनवी

जिस को आदत वस्ल की हो हिज्र से क्यूँकर बने

रशीद लखनवी

है बे-ख़ुद वस्ल में दिल हिज्र में मुज़्तर सिवा होगा

रशीद लखनवी

दिला मा'शूक़ जो होता है वो सफ़्फ़ाक होता है

रशीद लखनवी

मौसम-ए-गुल भी मिरे घर आया

रशीद कामिल

घर भी है घर में सभी अपने भी हैं

रशीद अफ़रोज़

तन्हाइयों के दर्द से रिसता हुआ लहू

रशीद अफ़रोज़

शो'ला शमीम-ए-ज़ुल्फ़ से आगे बढ़ा नहीं

रशीद अफ़रोज़

उठ रहा है धुआँ मिरे घर में

रसा चुग़ताई

इस घर की सारी दीवारें शीशे की हैं

रसा चुग़ताई

उम्र गुज़री रहगुज़र के आस-पास

रसा चुग़ताई

शाम से पहले घर गए होते

रसा चुग़ताई

रात हम ने जहाँ बसर की है

रसा चुग़ताई

कहाँ जाते हैं आगे शहर-ए-जाँ से

रसा चुग़ताई

दिल ने अपनी ज़बाँ का पास किया

रसा चुग़ताई

अपनी बे-चेहरगी में पत्थर था

रसा चुग़ताई

परिंदे होते अगर हम हमारे पर होते

रऊफ़ अमीर

झुलसती धूप में ठंडी हवा का झोंका भेज

रऊफ़ अमीर

जनाज़ा धूम से उस आशिक़-ए-जाँ-बाज़ का निकले

रंजूर अज़ीमाबादी

मनअ करते हो अबस यारो आज

रंगीन सआदत यार ख़ाँ

बादल आए हैं घिर गुलाल के लाल

रंगीन सआदत यार ख़ाँ

इश्क़ से बच के किधर जाएँगे हम

रंगीन सआदत यार ख़ाँ

सब की आँखें तो खुली हैं देखता कोई नहीं

राणा गन्नौरी

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