घर Poetry (page 61)

न मंज़िलें थीं न कुछ दिल में था न सर में था

राजेन्द्र मनचंदा बानी

मस्त उड़ते परिंदों को आवाज़ मत दो कि डर जाएँगे

राजेन्द्र मनचंदा बानी

ख़ाक ओ ख़ूँ की वुसअतों से बा-ख़बर करती हुई

राजेन्द्र मनचंदा बानी

इधर की आएगी इक रौ उधर की आएगी

राजेन्द्र मनचंदा बानी

हरी सुनहरी ख़ाक उड़ाने वाला मैं

राजेन्द्र मनचंदा बानी

हमें लपकती हवा पर सवार ले आई

राजेन्द्र मनचंदा बानी

ग़ाएब हर मंज़र मेरा

राजेन्द्र मनचंदा बानी

इक गुल-ए-तर भी शरर से निकला

राजेन्द्र मनचंदा बानी

दिन को दफ़्तर में अकेला शब भरे घर में अकेला

राजेन्द्र मनचंदा बानी

अक्स कोई किसी मंज़र में न था

राजेन्द्र मनचंदा बानी

कल चमन था आज इक सहरा हुआ

राजेन्द्र कृष्ण

शाम को जिस वक़्त ख़ाली हाथ घर जाता हूँ मैं

राजेश रेड्डी

यूँ देखिए तो आँधी में बस इक शजर गया

राजेश रेड्डी

कुछ इस क़दर मैं ख़िरद के असर में आ गया हूँ

राजेश रेड्डी

जिस को भी देखो तिरे दर का पता पूछता है

राजेश रेड्डी

शाम कठिन है रात कड़ी है

राजेन्द्र नाथ रहबर

महताब नहीं निकला सितारे नहीं निकले

राजेन्द्र नाथ रहबर

तर्क जिस दिन से किया हम ने शकेबाई का

रजब अली बेग सुरूर

नासेहा फ़ाएदा क्या है तुझे बहकाने से

रजब अली बेग सुरूर

मरीज़-ए-हिज्र को सेहत से अब तो काम नहीं

रजब अली बेग सुरूर

किस तरह पर ऐसे बद-ख़ू से सफ़ाई कीजिए

रजब अली बेग सुरूर

ये सास है कि शेर छुपा है नक़ाब में

राजा मेहदी अली ख़ाँ

क़स्र-ए-वीराँ

राजा मेहदी अली ख़ाँ

मियाँ के दोस्त

राजा मेहदी अली ख़ाँ

ख़ुद-कुशी

राजा मेहदी अली ख़ाँ

ख़रगोशों की ग़ज़ल

राजा मेहदी अली ख़ाँ

जमाल-ज़ादा

राजा मेहदी अली ख़ाँ

जब शाम जन्नत में हुई

राजा मेहदी अली ख़ाँ

हमें हमारी बीवियों से बचाओ

राजा मेहदी अली ख़ाँ

एक चेहलुम पर

राजा मेहदी अली ख़ाँ

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