घर Poetry (page 60)

आधे घर में मैं होता हूँ आधे घर में तन्हाई

राना आमिर लियाक़त

कितने ख़्वाब समेटे कोई कितने दर्द कमाएगा

राना आमिर लियाक़त

अब ऐसे दश्त-मिज़ाजों से दूर घर लिया जाए

राना आमिर लियाक़त

इस सदी का जब कभी ख़त्म-ए-सफ़र देखेंगे लोग

रम्ज़ अज़ीमाबादी

ऐब जो मुझ में हैं मेरे हैं हुनर तेरा है

रम्ज़ अज़ीमाबादी

जब उन के पा-ए-नाज़ की ठोकर में आएगा

रम्ज़ आफ़ाक़ी

कभी बुलाओ, कभी मेरे घर भी आया करो

रमेश कँवल

ज़र्रा इंसान कभी दश्त-नगर लगता है

राम रियाज़

किसी मरक़द का ही ज़ेवर हो जाएँ

राम रियाज़

साए से हौसले के बिदकते हैं रास्ते

राम प्रकाश राही

किस ने कहा था शहर में आ कर आँख लड़ाओ दीवारों से

राम प्रकाश राही

हम तो दिन-रात इसी सोच में मर जाएँगे

राम नाथ असीर

क्या ग़ज़ब है कि मुलाक़ात का इम्काँ भी नहीं

राम कृष्ण मुज़्तर

ये ज़ख़्म ज़ख़्म बदन और नम फ़ज़ाओं में

राम अवतार गुप्ता मुज़्तर

क़सीदा फ़त्ह का दुश्मन की तलवारों पे लिक्खा है

राम अवतार गुप्ता मुज़्तर

जो भी देना है वो ख़ुदा देगा

राम अवतार गुप्ता मुज़्तर

वो जो होती थी फ़ज़ा-ए-दास्तानी ले गया

रख़शां हाशमी

कहा गया न कभी और कभी सुना न गया

रख़शां हाशमी

अना से देखो कितना भर गए हैं

रजनीश सचन

वो लोग जो कभी बाहर न घर से झाँकते थे

राजेन्द्र मनचंदा बानी

कोई भी घर में समझता न था मिरे दुख सुख

राजेन्द्र मनचंदा बानी

दिन को दफ़्तर में अकेला शब भरे घर में अकेला

राजेन्द्र मनचंदा बानी

ढलेगी शाम जहाँ कुछ नज़र न आएगा

राजेन्द्र मनचंदा बानी

मामूल

राजेन्द्र मनचंदा बानी

औरत कुत्ता और पड़ोस

राजेन्द्र मनचंदा बानी

वो जिसे अब तक समझता था मैं पत्थर, सामने था

राजेन्द्र मनचंदा बानी

सफ़र है मिरा अपने डर की तरफ़

राजेन्द्र मनचंदा बानी

सद-सौग़ात सकूँ फ़िरदौस सितंबर आ

राजेन्द्र मनचंदा बानी

क़दम ज़मीं पे न थे राह हम बदलते क्या

राजेन्द्र मनचंदा बानी

पी चुके थे ज़हर-ए-ग़म ख़स्ता-जाँ पड़े थे हम चैन था

राजेन्द्र मनचंदा बानी

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