घर Poetry (page 62)

चार बजे

राजा मेहदी अली ख़ाँ

अदीब की महबूबा

राजा मेहदी अली ख़ाँ

मैं संगलाख़ ज़मीनों के राज़ कहता हूँ

राज नारायण राज़

क्या बात थी कि जो भी सुना अन-सुना हुआ

राज नारायण राज़

शामिल तू मिरे जिस्म मैं साँसों की तरह है

रईस सिद्दीक़ी

हँसी हँसी में हर इक ग़म छुपाने आते हैं

रईस सिद्दीक़ी

आज की रात

रईस फ़रोग़

ऊपर बादल नीचे पर्बत बीच में ख़्वाब ग़ज़ालाँ का

रईस फ़रोग़

हवा ने बादल से क्या कहा है

रईस फ़रोग़

गर्म ज़मीं पर आ बैठे हैं ख़ुश्क लब-ए-महरूम लिए

रईस फ़रोग़

गलियों में आज़ार बहुत हैं घर में जी घबराता है

रईस फ़रोग़

अपनी मिट्टी को सर-अफ़राज़ नहीं कर सकते

रईस फ़रोग़

आँखों के कश्कोल शिकस्ता हो जाएँगे शाम को

रईस फ़रोग़

आँखें जिन को देख न पाएँ सपनों में बिखरा देना

रईस फ़रोग़

तुम ऐ रईस! अब न अगर और मगर करो

रईस अमरोहवी

तिरा ख़याल कि ख़्वाबों में जिन से है ख़ुशबू

रईस अमरोहवी

कल रात कई ख़्वाब-ए-परेशाँ नज़र आए

रईस अमरोहवी

हिज्र से वस्ल इस क़दर भारी

रईस अमरोहवी

दिल छोड़ के हर राहगुज़र ढूँढ रहा हूँ

रहमत इलाही बर्क़ आज़मी

दब गईं मौजें यकायक जोश में आने के बा'द

रहमत इलाही बर्क़ आज़मी

'मीर' की सादगी बयान में रख

रहमत अमरोहवी

आरज़ूओं का नगर छोड़ आए

रहमत अमरोहवी

आगही जिस मक़ाम पर ठहरी

रहमान जामी

दिल की बर्बादी के आसार अभी बाक़ी हैं

राही शहाबी

अश्क आँखों में और दिल में आहों के शरर देखे

राही शहाबी

लहू आँखों में रौशन है ये मंज़र देखना अब के

राही कुरैशी

जिन से हम छूट गए अब वो जहाँ कैसे हैं

राही मासूम रज़ा

हर इक फ़न में यक़ीनन ताक़ है वो

राही फ़िदाई

नक़ाब चेहरे से उस के कभी सरकता था

इरफ़ान अहमद

कितनी दूर से चलते चलते ख़्वाब-नगर तक आई हूँ

इरम ज़ेहरा

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