घर Poetry (page 56)

यही दुआ है यही है सलाम इश्क़ ब-ख़ैर

रहमान फ़ारिस

नज़र उठाएँ तो क्या क्या फ़साना बनता है

रहमान फ़ारिस

ख़ाक उड़ती है रात-भर मुझ में

रहमान फ़ारिस

क्या से क्या हो गई इस दौर में हालत घर की

रहबर जौनपूरी

अंजाम-ए-इंतिहा-ए-सफ़र देखते चलें

रहबर जौनपूरी

तेरी गली को छोड़ के जाना तो है नहीं

रेहाना रूही

कोई जादू न फ़साना न फ़ुसूँ है यूँ है

रेहाना रूही

हसीन दुनिया उजड़ गई तो

रेहान अल्वी

शायद कभी ऐसा हो कुछ फ़िल्म सा कर जाऊँ

रज़्ज़ाक़ अरशद

हर आने वाले पल से डर रहा हूँ

रज़्ज़ाक़ अरशद

इस समुंदर पे इक इल्ज़ाम ही धर जाना है

रज़्ज़ाक़ अादिल

दिल के दर्द के कम होने का तन्हा कुछ सामान हुआ

रज़िया फ़सीह अहमद

आँसू अपनी चश्म-ए-तर से निकलें तो

राज़िक़ अंसारी

तुम्हीं बताओ वो कौन है जो हर एक लम्हा सता रहा है

रज़िया हलीम जंग

कितने नायाब थे लम्हे जो वहाँ पर गुज़रे

रज़िया हलीम जंग

सौ रहा था तो शोर बरपा था

रज़ी तिर्मिज़ी

दर्द-ओ-ग़म सब सुनाने बैठे हैं

रज़ी रज़ीउद्दीन

दहका पड़ा है जामा-ए-गुल यार ख़ैर हो

रज़ी रज़ीउद्दीन

अब भी उसी तरह से इसे इंतिज़ार है

रज़ी रज़ीउद्दीन

सफ़र कठिन ही सही क्या अजब था साथ उस का

राज़ी अख्तर शौक़

कैसे कटे क़सीदा-गो हर्फ़-गरों के दरमियाँ

राज़ी अख्तर शौक़

कैसे इस शहर में रहना होगा

राज़ी अख्तर शौक़

जिस पल मैं ने घर की इमारत ख़्वाब-आसार बनाई थी

राज़ी अख्तर शौक़

इन्ही गलियों में इक ऐसी गली है

राज़ी अख्तर शौक़

हलाक-ए-कश्मकश-ए-राएगाँ बहुत से हैं

राज़ी अख्तर शौक़

आवार्गान-ए-शौक़ सभी घर के हो गए

राज़ी अख्तर शौक़

मुहक़क़िक़

रज़ा नक़वी वाही

यूँही ज़ालिम का रहा राज अगर अब के बरस

रज़ा मौरान्वी

ख़ुश्क दामन पे बरसने नहीं देती मुझ को

रज़ा मौरान्वी

इस तरह आँखों को नम दिल पर असर करते हुए

रज़ा मौरान्वी

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