घर Poetry (page 76)

कृष्ण कन्हैया

हफ़ीज़ जालंधरी

इश्क़ में छेड़ हुई दीदा-ए-तर से पहले

हफ़ीज़ जालंधरी

इन गेसुओं में शाना-ए-अरमाँ न कीजिए

हफ़ीज़ जालंधरी

आख़िर एक दिन शाद करोगे

हफ़ीज़ जालंधरी

समझ के आग लगाना हमारे घर में तुम

हफ़ीज़ बनारसी

किसी का घर जले अपना ही घर लगे है मुझे

हफ़ीज़ बनारसी

हिसार-ए-ज़ात के दीवार-ओ-दर में क़ैद रहे

हफ़ीज़ बनारसी

लब-ए-फ़ुरात वही तिश्नगी का मंज़र है

हफ़ीज़ बनारसी

हमारे अहद का मंज़र अजीब मंज़र है

हफ़ीज़ बनारसी

वापसी

हबीब तनवीर

ज़ुल्मत को ज़िया सरसर को सबा बंदे को ख़ुदा क्या लिखना

हबीब जालिब

यौम-ए-मई

हबीब जालिब

लायल-पूर

हबीब जालिब

ऐ जहाँ देख ले!

हबीब जालिब

ज़र्रे ही सही कोह से टकरा तो गए हम

हबीब जालिब

तुम से पहले वो जो इक शख़्स यहाँ तख़्त-नशीं था

हबीब जालिब

महताब-सिफ़त लोग यहाँ ख़ाक-बसर हैं

हबीब जालिब

लोग गीतों का नगर याद आया

हबीब जालिब

क्या क्या लोग गुज़र जाते हैं रंग-बिरंगी कारों में

हबीब जालिब

कभी तो मेहरबाँ हो कर बुला लें

हबीब जालिब

दयार-ए-'दाग़'-ओ-'बेख़ुद' शहर-ए-देहली छोड़ कर तुझ को

हबीब जालिब

दरख़्त सूख गए रुक गए नदी नाले

हबीब जालिब

कोई बात ऐसी आज ऐ मेरी गुल-रुख़्सार बन जाए

हबीब मूसवी

है आठ पहर तू जल्वा-नुमा तिमसाल-ए-नज़र है परतव-ए-रुख़

हबीब मूसवी

अक़्ल पर पत्थर पड़े उल्फ़त में दीवाना हुआ

हबीब मूसवी

क़तरा क़तरा पिघलने वाला है

हबीब कैफ़ी

गर मैं नहीं तो दर्द का पैकर कोई तो है

हबीब कैफ़ी

हम अहल-ए-आरज़ू पे अजब वक़्त आ पड़ा

हबीब हैदराबादी

तमाम रात बुझेंगे न मेरे घर के चराग़

हबाब तिर्मिज़ी

हुआ करे जो अँधेरा बहुत घनेरा है

ज्ञान चंद जैन

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