घर Poetry (page 75)

अंदर की दुनियाएँ मिला के एक नगर हो जाएँ

हैदर क़ुरैशी

ख़ून मज़दूर का मिलता जो न तामीरों में

हैदर अली जाफ़री

न सर छुपाने को घर था न आब-ओ-दाना था

हैदर अली जाफ़री

इर्तिकाब-ए-जुर्म शर की बात है

हैदर अली जाफ़री

होता फ़नकार-ए-जदीद और न शाएर होता

हैदर अली जाफ़री

न जब तक कोई हम-प्याला हो मैं मय नहीं पीता

हैदर अली आतिश

मसनद-ए-शाही की हसरत हम फ़क़ीरों को नहीं

हैदर अली आतिश

भरा है शीशा-ए-दिल को नई मोहब्बत से

हैदर अली आतिश

ऐसी ऊँची भी तो दीवार नहीं घर की तिरे

हैदर अली आतिश

आज तक अपनी जगह दिल में नहीं अपने हुई

हैदर अली आतिश

वो नाज़नीं ये नज़ाकत में कुछ यगाना हुआ

हैदर अली आतिश

सब्ज़ा बाला-ए-ज़क़न दुश्मन है ख़ल्क़ुल्लाह का

हैदर अली आतिश

ना-फ़हमी अपनी पर्दा है दीदार के लिए

हैदर अली आतिश

मुंतज़िर था वो तो जुस्त-ओ-जू में ये आवारा था

हैदर अली आतिश

मिरे दिल को शौक़-ए-फ़ुग़ाँ नहीं मिरे लब तक आती दुआ नहीं

हैदर अली आतिश

मगर उस को फ़रेब-ए-नर्गिस-ए-मस्ताना आता है

हैदर अली आतिश

ख़ार मतलूब जो होवे तो गुलिस्ताँ माँगूँ

हैदर अली आतिश

जब के रुस्वा हुए इंकार है सच बात में क्या

हैदर अली आतिश

दिल-लगी अपनी तिरे ज़िक्र से किस रात न थी

हैदर अली आतिश

दहन पर हैं उन के गुमाँ कैसे कैसे

हैदर अली आतिश

लहू से अपने ज़मीं लाला-ज़ार देखते थे

हफ़ीज़ मेरठी

बहुत दूर तो कुछ नहीं घर मिरा

हफ़ीज़ जौनपुरी

उस को आज़ादी न मिलने का हमें मक़्दूर है

हफ़ीज़ जौनपुरी

उन की ये ज़िद कि मिरे घर में न आए कोई

हफ़ीज़ जौनपुरी

शब-ए-विसाल ये कहते हैं वो सुना के मुझे

हफ़ीज़ जौनपुरी

जब तक कि तबीअ'त से तबीअत नहीं मिलती

हफ़ीज़ जौनपुरी

हम को दिखा दिखा के ग़ैरों के इत्र मलना

हफ़ीज़ जौनपुरी

दिल में हैं वस्ल के अरमान बहुत

हफ़ीज़ जौनपुरी

दिल है तो तिरे वस्ल के अरमान बहुत हैं

हफ़ीज़ जौनपुरी

तकिया

हफ़ीज़ जालंधरी

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