गुल Poetry (page 26)
हार बना इन पारा-ए-दिल का माँग न गजरा फूलों का
शाह नसीर
इक क़ाफ़िला है बिन तिरे हम-राह सफ़र में
शाह नसीर
दिल में है क्या जानिए किस का ख़याल-ए-नक़्श-ए-पा
शाह नसीर
दिल को किस सूरत से कीजे चश्म-ए-दिलबर से जुदा
शाह नसीर
देख तू यार-ए-बादा-कश! मैं ने भी काम क्या किया
शाह नसीर
दम ले ऐ कोहकन अब तेशा-ज़नी ख़ूब नहीं
शाह नसीर
छोड़ा न तुझे ने राम क्या ये भी न हुआ वो भी न हुआ
शाह नसीर
चश्म में कब अश्क भर लाते हैं हम
शाह नसीर
बयाबाँ मर्ग है मजनून-ए-ख़ाक-आलूदा-तन किस का
शाह नसीर
जूँ क़दम यार ने घर से मिरे दर पर रक्खा
शाह कमालउद्दीन कमाल
ना-गुज़ीर-ए-रिश्तगी सा है तो हो
शाह हुसैन नहरी
सुब्हा से है न काम न ज़ुन्नार से ग़रज़
शाह आसिम
सन लेवे अगर तू मिरी दिलदार की आवाज़
शाह आसिम
लश्कर-ए-इश्क़ आ पड़ा है मुल्क-ए-दिल पर टूट टूट
शाह आसिम
बे-ख़ुदी में अजब मज़ा देखा
शाह आसिम
अजब तू ने जल्वा दिखाया मुझे
शाह आसिम
क़फ़स में रह के गुल-ओ-नस्तरन की बात करो
शाग़िल क़ादरी
मौसम-ए-गुल आ गया फिर दश्त-पैमाई रहे
शाग़िल क़ादरी
उम्र भर डोलती यादों की ज़िया से खेले
शफ़क़त बटालवी
मौसम-ए-गुल है न दौर-जाम-ओ-सहबा रह गया
शफ़ीक़ जौनपुरी
कली पर मुस्कुराहट आज भी मालूम होती है
शफ़ीक़ जौनपुरी
ख़ुद अपनी आँच से इक शख़्स जल गया मुझ में
शफ़ी ज़ामिन
चमन की ख़ाक पे मौज-ए-बला ने रक़्स किया
शफ़क़ सुपुरी
दम-ए-ता'मीर तख़रीब-ए-जहाँ कुछ और कहती है
शायर फतहपुरी
हम उन से कर गए हैं किनारा कभी कभी
शादाँ इंदौरी
सजे हैं हर तरफ़ बाज़ार ऐसा क्यूँ नहीं होता
शादाब उल्फ़त
ये सनम भी घटोर कितने हैं
शाद लखनवी
वो मय-परस्त हूँ बदली न जब नज़र आई
शाद लखनवी
टूटे जो दाँत मुँह की शबाहत बिगड़ गई
शाद लखनवी
शर्तें जो बंदगी में लगाना रवा हुआ
शाद लखनवी
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