गुल Poetry (page 27)

शगुफ़्ता होते ही मुरझा गई कली अफ़सोस

शाद लखनवी

न जान कर गुल-ए-बाज़ी बहुत उछाल के फेंक

शाद लखनवी

लुंज वो पा-ए-तलब हूँ कहीं जा ही न सकूँ

शाद लखनवी

क्या कहूँ ग़ुंचा-ए-गुल नीम-दहाँ है कुछ और

शाद लखनवी

जो बीच में आइना हो प्यारे इधर हमारे उधर तुम्हारे

शाद लखनवी

हम वो नालाँ हैं बोली-ठोली में

शाद लखनवी

हुई तो जा दिल में उस सनम की नमाज़ में सर झुका झुका कर

शाद लखनवी

हर शब ख़याल-ए-ग़ैर के मारे अलग-थलग

शाद लखनवी

गोश कर फ़रियाद-ए-आशिक़ जान कर

शाद लखनवी

ग़ैरों में हिना वो मल रहा है

शाद लखनवी

गर जुनूँ कर मुझे पाबंद-ए-सलासिल जाता

शाद लखनवी

चमन में जा के हम ने ग़ौर से औराक़-ए-गुल देखे

शाद अज़ीमाबादी

तेरी ज़ुल्फ़ें ग़ैर अगर सुलझाएगा

शाद अज़ीमाबादी

क्या फ़क़त तालिब-ए-दीदार था मूसा तेरा

शाद अज़ीमाबादी

किस पे क़ाबू जो तुझी पे नहीं क़ाबू अपना

शाद अज़ीमाबादी

फ़क़त शोर-ए-दिल-ए-पुर-आरज़ू था

शाद अज़ीमाबादी

ख़ुशबुओं से मिरी हर साँस को भर देता है

शबनम वहीद

ये सिलसिले भी रिफ़ाक़त के कुछ अजीब से हैं

शबनम शकील

तेरी ताबिश से रौशन हैं गुल भी और वीराने भी

शबनम रूमानी

मेरे प्यार का क़िस्सा तो हर बस्ती में मशहूर है चाँद

शबनम रूमानी

मैं ने किस शौक़ से इक उम्र ग़ज़ल-ख़्वानी की

शबनम रूमानी

फूल और सितारा

शब्बीर शाहिद

आ गया है वक़्त अब भुगतोगे ख़ामियाज़े बहुत

शबाब ललित

अभी तक उन के वही सितम हैं जफ़ा की ख़ू भी नहीं गई है

शबाब

आशिक़ की जान जाती है इस बाँकपन को छोड़

शबाब

सहरा की बे-आब ज़मीं पर एक चमन तय्यार किया

शायर लखनवी

इक तबस्सुम से हम ने रोक लिए

शायर लखनवी

आँसू शो'लों में ढल रहे हैं

शायर लखनवी

नग़्मा यूँ साज़ में तड़पा मिरी जाँ हो जैसे

शानुल हक़ हक़्क़ी

हर-चंद कि साग़र की तरह जोश में रहिए

शानुल हक़ हक़्क़ी

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