हाथ Poetry (page 24)

दम-ब-ख़ुद हम तो डरे बैठे हैं

शाद लखनवी

निहायत इंकिसारी आजिज़ी से बात करते हैं

शाद बिलगवी

हाथ से हाथ मिला दिल से तबीअ'त न मिली

शाद बिलगवी

ये बज़्म-ए-मय है याँ कोताह-दोस्ती में है महरूमी

शाद अज़ीमाबादी

निगाह-ए-नाज़ से साक़ी का देखना मुझ को

शाद अज़ीमाबादी

लुत्फ़ क्या है बे-ख़ुदी का जब मज़ा जाता रहा

शाद अज़ीमाबादी

क्यूँ हो बहाना-जू न क़ज़ा सर से पाँव तक

शाद अज़ीमाबादी

काबा ओ दैर में जल्वा नहीं यकसाँ उन का

शाद अज़ीमाबादी

जिसे पाला था इक मुद्दत तक आग़ोश-ए-तमन्ना में

शाद अज़ीमाबादी

हरगिज़ कभी किसी से न रखना दिला ग़रज़

शाद अज़ीमाबादी

ग़म-ए-फ़िराक़ मय ओ जाम का ख़याल आया

शाद अज़ीमाबादी

फ़क़त शोर-ए-दिल-ए-पुर-आरज़ू था

शाद अज़ीमाबादी

हम-नशीनो कुछ नहीं रक्खा यहाँ पर कुछ नहीं

शबनम शकील

बदल चुकी है हर इक याद अपनी सूरत भी

शबनम शकील

ख़्वाब देखूँ कि रतजगे देखूँ

शबनम रूमानी

नज़्म

शबनम अशाई

नज़्म

शबनम अशाई

नज़्म

शबनम अशाई

नज़्म

शबनम अशाई

किन सोचों में डूबे हो

शबनम अशाई

मय-ए-फ़राग़त का आख़िरी दौर चल रहा था

शब्बीर शाहिद

बहुत कुछ लिखा है बहुत कुछ लिखेंगे

शब्बीर नकिद

मैं हाथ बाँधे हुए लौट आई हूँ घर में

शबाना यूसुफ़

उसी के क़ुर्ब में रह कर हरी भरी हुई है

शबाना यूसुफ़

ले के बे-शक हाथ में ख़ंजर चलो

शबाब ललित

बरतर समाज से कोई फ़नकार भी नहीं

शबाब ललित

हवा को और भी कुछ तेज़ कर गए हैं लोग

शायर लखनवी

अपनी तलब का नाम डुबोने क्यूँ जाएँ मय-ख़ाने तक

शायर लखनवी

इक महक सी दम-ए-तहरीर कहाँ से आई

शानुल हक़ हक़्क़ी

शैख़ पर हाथ उठाने के नहीं हम क़ाएल

शाद आरफ़ी

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