हाथ Poetry (page 47)

वापसी

हबीब तनवीर

ज़ुल्मत को ज़िया सरसर को सबा बंदे को ख़ुदा क्या लिखना

हबीब जालिब

यौम-ए-मई

हबीब जालिब

अहद-ए-सज़ा

हबीब जालिब

शे'र होता है अब महीनों में

हबीब जालिब

हज़रत-ए-वाइज़ न ऐसा वक़्त हाथ आएगा फिर

हबीब मूसवी

वो उट्ठे हैं तेवर बदलते हुए

हबीब मूसवी

शब कि मुतरिब था शराब-ए-नाब थी पैमाना था

हबीब मूसवी

रोना इन का काम है हर दम जल जल कर मर जाना भी

हबीब मूसवी

देख लो तुम ख़ू-ए-आतिश ऐ क़मर शीशे में है

हबीब मूसवी

उन निगाहों को अजब तर्ज़-ए-कलाम आता है

हबीब अहमद सिद्दीक़ी

साग़र में शक्ल-ए-दुख़्तर-ए-रज़ कुछ बदल गई

गुस्ताख़ रामपुरी

उस का चेहरा भी चमक में न मिसाली निकला

गुलज़ार बुख़ारी

काँच के पार तिरे हाथ नज़र आते हैं

गुलज़ार

नज़्म

गुलज़ार

ख़ुदा

गुलज़ार

कंधे झुक जाते हैं

गुलज़ार

इमेजेज़

गुलज़ार

एक ख़्वाब

गुलज़ार

एक दौर

गुलज़ार

दस्तक

गुलज़ार

ज़िक्र आए तो मिरे लब से दुआएँ निकलें

गुलज़ार

रुके रुके से क़दम रुक के बार बार चले

गुलज़ार

गुलों को सुनना ज़रा तुम सदाएँ भेजी हैं

गुलज़ार

दिखाई देते हैं धुँद में जैसे साए कोई

गुलज़ार

ऐसा ख़ामोश तो मंज़र न फ़ना का होता

गुलज़ार

उठो गले से लिपट जाओ फिर निखर लेना

गुलशनुद्दौला बहार

वो चराग़-ए-ज़ीस्त बन कर राह में जलता रहा

गुलनार आफ़रीन

वो चराग़-ए-ज़ीस्त बन कर राह में जलता रहा

गुलनार आफ़रीन

कभी हाथ भी आएगा यार सच कह

ग़ुलाम यहया हुज़ूर अज़ीमाबादी

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