हाथ Poetry (page 49)

दफ़्तर में ज़ेहन घर निगह रास्ते में पाँव

ग़ज़नफ़र

तेज़ होती जा रही है किस लिए धड़कन मिरी

ग़ज़नफ़र

सामान-ए-ऐश सारा हमें यूँ तू दे गया

ग़ज़नफ़र

सजा के ज़ेहन में कितने ही ख़्वाब सोए थे

ग़ज़नफ़र

न होते शाद आईन-ए-गुलिस्ताँ देखने वाले

ग़ौस मोहम्मद ग़ौसी

आदमी की हयात मुट्ठी भर

ग़नी एजाज़

उस शो'ला-रू से जब से मिरी आँख जा लगी

ग़मगीन देहलवी

मिरा उस के पस-ए-दीवार घर होता तो क्या होता

ग़मगीन देहलवी

वा-हसरता कि यार ने खींचा सितम से हाथ

ग़ालिब

शोरीदगी के हाथ से है सर वबाल-ए-दोश

ग़ालिब

रौ में है रख़्श-ए-उम्र कहाँ देखिए थमे

ग़ालिब

मैं ने माना कि कुछ नहीं 'ग़ालिब'

ग़ालिब

लिखते रहे जुनूँ की हिकायात-ए-ख़ूँ-चकाँ

ग़ालिब

इस सादगी पे कौन न मर जाए ऐ ख़ुदा

ग़ालिब

इस नज़ाकत का बुरा हो वो भले हैं तो क्या

ग़ालिब

गो हाथ को जुम्बिश नहीं आँखों में तो दम है

ग़ालिब

वो आ के ख़्वाब में तस्कीन-ए-इज़्तिराब तो दे

ग़ालिब

सब कहाँ कुछ लाला-ओ-गुल में नुमायाँ हो गईं

ग़ालिब

नुक्ता-चीं है ग़म-ए-दिल उस को सुनाए न बने

ग़ालिब

क्यूँ जल गया न ताब-ए-रुख़-ए-यार देख कर

ग़ालिब

कल के लिए कर आज न ख़िस्सत शराब में

ग़ालिब

जब तक दहान-ए-ज़ख़्म न पैदा करे कोई

ग़ालिब

हासिल से हाथ धो बैठ ऐ आरज़ू-ख़िरामी

ग़ालिब

दिया है दिल अगर उस को बशर है क्या कहिए

ग़ालिब

दीवानगी से दोश पे ज़ुन्नार भी नहीं

ग़ालिब

दिल-ए-नादाँ तुझे हुआ क्या है

ग़ालिब

बे-ए'तिदालियों से सुबुक सब में हम हुए

ग़ालिब

बज़्म-ए-शाहंशाह में अशआर का दफ़्तर खुला

ग़ालिब

बाज़ीचा-ए-अतफ़ाल है दुनिया मिरे आगे

ग़ालिब

आईना देख अपना सा मुँह ले के रह गए

ग़ालिब

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