हाथ Poetry (page 7)

ये कमरा और ये गर्द-ओ-ग़ुबार उस का है

यासमीन हबीब

ज़ख़्म मेरे दिल पे इक ऐसा लगा

यासीन अफ़ज़ाल

रू-ब-रू बुत के दुआ की भूल हो जाए तो फिर

याक़ूब तसव्वुर

गर्दिश-ए-मुक़द्दर का सिलसिला जो चल जाए

याक़ूब तसव्वुर

हवा-ए-सुब्ह-ए-नुमू दुश्मन-ए-चमन कैसे

याक़ूब राही

ख़ुदा गवाह

यहया अमजद

वहशत थी हम थे साया-ए-दीवार-ए-यार था

यगाना चंगेज़ी

साया अगर नसीब हो दीवार-ए-यार का

यगाना चंगेज़ी

जब हुस्न-ए-बे-मिसाल पर इतना ग़ुरूर था

यगाना चंगेज़ी

दामन-ए-क़ातिल जो उड़ उड़ कर हवा देने लगे

यगाना चंगेज़ी

अगर अपनी चश्म-ए-नम पर मुझे इख़्तियार होता

यगाना चंगेज़ी

क़ब्र पर बाद-ए-फ़ना आइएगा

वज़ीर अली सबा लखनवी

किस मुँह से कहें गुनाह क्या हैं

वज़ीर अली सबा लखनवी

जो अदू-ए-बाग़ हो बरबाद हो

वज़ीर अली सबा लखनवी

देख कर ख़ुश-रंग उस गुल-पैरहन के हाथ पाँव

वज़ीर अली सबा लखनवी

बे-ताबी-ए-दिल ने ज़ार-पा कर

वज़ीर अली सबा लखनवी

आप अपनी बेवफ़ाई देखिए

वज़ीर अली सबा लखनवी

थकन

वज़ीर आग़ा

पेश-गोई

वज़ीर आग़ा

निरवान

वज़ीर आग़ा

कराँ-ता-कराँ

वज़ीर आग़ा

भूरी मिट्टी की तह को हटाएँ

वज़ीर आग़ा

बंधन

वज़ीर आग़ा

अंधी काली रात का धब्बा

वज़ीर आग़ा

उड़ी जो गर्द तो इस ख़ाक-दाँ को पहचाना

वज़ीर आग़ा

मुद्दतों उस की ख़्वाहिश से चलते रहे हाथ आता नहीं

वसी शाह

कितनी ज़ुल्फ़ें उड़ीं कितने आँचल उड़े चाँद को क्या ख़बर

वसी शाह

आँखों में चुभ गईं तिरी यादों की किर्चियाँ

वसी शाह

बाज़ औक़ात फ़राग़त में इक ऐसा लम्हा आता है

वसीम ताशिफ़

नज़्अ' में प्यार से क्यूँ पूछते हो तुम मुझ को

वसीम ख़ैराबादी

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