हाथ Poetry (page 6)

सर्द रुतों में लोगों को गर्मी पहुँचाने वाले हाथ

ज़फ़र कलीम

गुमान तक में न था महव-ए-यास कर देगा

ज़फ़र कलीम

वो चेहरा हाथ में ले कर किताब की सूरत

ज़फ़र इक़बाल

रौ में आए तो वो ख़ुद गर्मी-ए-बाज़ार हुए

ज़फ़र इक़बाल

चूमने के लिए थाम रख्खूँ कोई दम वो हाथ

ज़फ़र इक़बाल

ये बात अलग है मिरा क़ातिल भी वही था

ज़फ़र इक़बाल

सोचता हूँ कि अपनी रज़ा के लिए छोड़ दूँ

ज़फ़र इक़बाल

मौसम का हाथ है न हवा है ख़लाओं में

ज़फ़र इक़बाल

कुछ नहीं समझा हूँ इतना मुख़्तसर पैग़ाम था

ज़फ़र इक़बाल

कोई किनाया कहीं और बात करते हुए

ज़फ़र इक़बाल

बेवफ़ाई करके निकलूँ या वफ़ा कर जाऊँगा

ज़फ़र इक़बाल

बस एक बार किसी ने गले लगाया था

ज़फ़र इक़बाल

बात ऐसी भी कोई नहीं कि मोहब्बत बहुत ज़ियादा है

ज़फ़र इक़बाल

अभी आँखें खुली हैं और क्या क्या देखने को

ज़फ़र इक़बाल

अपने दिल-ए-मुज़्तर को बेताब ही रहने दो

ज़फ़र हमीदी

शजर के क़त्ल में इस का भी हाथ है शायद

ज़फ़र गोरखपुरी

सिलसिले के बाद कोई सिलसिला रौशन करें

ज़फ़र गोरखपुरी

मिरा क़लम मिरे जज़्बात माँगने वाले

ज़फ़र गोरखपुरी

कौन याद आया ये महकारें कहाँ से आ गईं

ज़फ़र गोरखपुरी

देखें क़रीब से भी तो अच्छा दिखाई दे

ज़फ़र गोरखपुरी

उम्मीद-ए-सुब्ह-ए-बहाराँ ख़िज़ाँ से खींचते हैं

ज़फ़र अज्मी

आ के जब ख़्वाब तुम्हारे ने कहा बिस्मिल्लाह

ज़फ़र अज्मी

आओ पुरानी याद के शो'लों में ताप लें

यूसुफ़ तक़ी

मैं जीना चाहता हूँ मगर

यूसुफ़ तक़ी

लम्हा लम्हा फैलती जाती है रात

यूसुफ़ तक़ी

सिमटे रहे तो दर्द की तन्हाइयाँ मिलीं

यूसुफ़ आज़मी

बताऊँ मैं तुम्हें आँखों में आँसू या लहू क्या है

यूनुस ग़ाज़ी

सहन-ए-चमन में हर-सू पत्थर

यज़दानी जालंधरी

मुझे आगही का निशाँ समझ के मिटाओ मत

यासमीन हामिद

किसी ख़सारे के सौदे में हाथ आया था

यासमीन हबीब

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