हाथ Poetry (page 8)

क्या हुआ उस ने जो आशिक़ से जफ़ाकारी की

वसीम ख़ैराबादी

भर दीं शबाब ने ये उन आँखों में शोख़ियाँ

वसीम ख़ैराबादी

किसी ने रख दिए ममता-भरे दो हाथ क्या सर पर

वसीम बरेलवी

अदना सा बासी

वसीम बरेलवी

सब ने मिलाए हाथ यहाँ तीरगी के साथ

वसीम बरेलवी

मुझे तो क़तरा ही होना बहुत सताता है

वसीम बरेलवी

मेरे ग़म को जो अपना बताते रहे

वसीम बरेलवी

मैं इस उमीद पे डूबा कि तू बचा लेगा

वसीम बरेलवी

दूर से ही बस दरिया दरिया लगता है

वसीम बरेलवी

अंधेरा ज़ेहन का सम्त-ए-सफ़र जब खोने लगता है

वसीम बरेलवी

सलीक़ा बोलने का हो तो बोलो

वक़ार मानवी

वो ज़िम्मेदारी कितनी ख़ुशी से निभाई थी

वक़ार ख़ान

मन की मय हो तो पियाले नहीं देखे जाते

वक़ार ख़ान

कभी सिसकी कभी आवाज़ा सफ़र जारी है

वक़ार ख़ान

जहाँ पे इल्म की कोई क़द्र और हवाला नहीं

वक़ार ख़ान

कुएँ जो पानी की बिन प्यास चाह रखते हैं

वक़ार हिल्म सय्यद नगलवी

उन की चश्म-ए-मस्त में पोशीदा इक मय-ख़ाना था

वक़ार बिजनोरी

पहचान लो उस को वही क़ातिल है हमारा

वामिक़ जौनपुरी

रात के समुंदर में ग़म की नाव चलती है

वामिक़ जौनपुरी

क़िर्तास पे नक़्शे हमें क्या क्या नज़र आए

वामिक़ जौनपुरी

जीने का लुत्फ़ कुछ तो उठाओ नशे में आओ

वामिक़ जौनपुरी

इस तरह से कश्ती भी कोई पार लगे है

वामिक़ जौनपुरी

बुलाए जाते हैं मक़्तल में हम सज़ा के लिए

वामिक़ जौनपुरी

तरवार खींच हम को दिखाते हो जब न तब

वलीउल्लाह मुहिब

मिलती है उसे गौहर-ए-शब-ताब की मीरास

वलीउल्लाह मुहिब

मा'रके में इश्क़ के सर से गुज़रने से न डर

वलीउल्लाह मुहिब

अश्क-बारी का मिरी आँखों ने ये बाँधा है झाड़

वलीउल्लाह मुहिब

तिरी वहशत की सरसर से उड़ा जूँ पात आँधी का

वली उज़लत

यार उठ गए दुनिया से अग़्यार की बारी है

वली उज़लत

नयन में ख़ूँ भर आया दिल में ख़ार-ए-ग़म छुपा शायद

वली उज़लत

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