हाथ Poetry (page 5)

ये ख़्वाबों के साए

ज़ाहिदा ज़ैदी

मिरे लोगो! मैं ख़ाली हाथ आया हूँ

ज़ाहिद मसूद

इन्फ़ॉर्मेशन टेक्नोलॉजी

ज़ाहिद मसूद

वक़्त के नाम एक ख़त

ज़ाहिद इमरोज़

तुम जा चुकी हो

ज़ाहिद इमरोज़

नीम-लिबासी का नौहा

ज़ाहिद इमरोज़

मेरा कोई दोस्त नहीं

ज़ाहिद इमरोज़

जहान-ए-तंग में तन्हा हुआ मैं

ज़ाहिद फ़ारानी

न जाने हम से गिला क्यूँ है तिश्ना-कामों को

ज़हीर सिद्दीक़ी

वजूद उस का कभी भी न लुक़्मा-ए-तर था

ज़हीर सिद्दीक़ी

हर गुल-ए-ताज़ा हमारे हाथ पर बैअत करे

ज़हीर सिद्दीक़ी

यूँ ही हम दर्द अपना खो रहे हैं

ज़हीर रहमती

दिल मर चुका है अब न मसीहा बना करो

ज़हीर काश्मीरी

काग़ज़ की नाव भी है खिलौने भी हैं बहुत

ज़हीर ग़ाज़ीपुरी

हर आदमी को ख़्वाब दिखाना मुहाल है

ज़हीर ग़ाज़ीपुरी

किस मुँह से हाथ उठाएँ फ़लक की तरफ़ 'ज़हीर'

ज़हीर देहलवी

आख़िर मिले हैं हाथ किसी काम के लिए

ज़हीर देहलवी

गेसू से अंबरी है सबा और सबा से हम

ज़हीर देहलवी

दिल को आज़ार लगा वो कि छुपा भी न सकूँ

ज़हीर देहलवी

दे हश्र के वादे पे उसे कौन भला क़र्ज़

ज़हीर देहलवी

इक शजर ऐसा मोहब्बत का लगाया जाए

ज़फर ज़ैदी

कितने हाथ सवाली हैं

ज़फ़र ताबिश

ये क्या तहरीर पागल लिख रहा है

ज़फ़र सहबाई

रखा है बज़्म में उस ने चराग़ कर के मुझे

ज़फ़र सहबाई

रखा है बज़्म में उस ने चराग़ कर के मुझे

ज़फ़र सहबाई

कभी कभी कोई चेहरा ये काम करता है

ज़फ़र सहबाई

चिलचिलाती धूप ने ग़ुस्सा उतारा हर जगह

ज़फ़र सहबाई

तमाम रंग जहाँ इल्तिजा के रक्खे थे

ज़फ़र मुरादाबादी

नक़ाब उस ने रुख़-ए-हुस्न-ए-ज़र पे डाल दिया

ज़फ़र मुरादाबादी

मोहब्बत की जिस को ख़ुमारी लगे

ज़फ़र कमाली

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