हुआ Poetry (page 14)
कुछ न कुछ रंज वो दे जाते हैं आते जाते
ज़हीर देहलवी
हाथ से हैहात क्या जाता रहा
ज़हीर देहलवी
गुल हुआ ये किस की हस्ती का चराग़
ज़हीर देहलवी
गेसू से अंबरी है सबा और सबा से हम
ज़हीर देहलवी
सूखी ज़मीं को याद के बादल भिगो गए
ज़हीर अहमद ज़हीर
ब-ज़ाहिर यूँ तो मैं सिमटा हुआ हूँ
ज़फ़र ताबिश
ब-ज़ाहिर यूँ तो मैं सिमटा हुआ हूँ
ज़फ़र ताबिश
तमाम शहर में कोई भी रू-शनास न था
ज़फ़र सिद्दीक़ी
ये क्या तहरीर पागल लिख रहा है
ज़फ़र सहबाई
सब्ज़े से सब दश्त भरे हैं ताल भरे हैं पानी से
ज़फ़र सहबाई
चिलचिलाती धूप ने ग़ुस्सा उतारा हर जगह
ज़फ़र सहबाई
अमीर-ए-शहर इस इक बात से ख़फ़ा है बहुत
ज़फ़र सहबाई
ऐ हम-सफ़र ये राह-बरी का गुमान छोड़
ज़फ़र सहबाई
ज़र्द पत्तों को हवा साथ लिए फिरती है
ज़फ़र रबाब
मिरी उम्मीद का सूरज कि तेरी आस का चाँद
ज़फ़र मुरादाबादी
ख़ुश-गुमाँ हर आसरा बे-आसरा साबित हुआ
ज़फ़र मुरादाबादी
तमाम रंग जहाँ इल्तिजा के रक्खे थे
ज़फ़र मुरादाबादी
ख़ुश-गुमाँ हर आसरा बे-आसरा साबित हुआ
ज़फ़र मुरादाबादी
कभी दुआ तो कभी बद-दुआ से लड़ते हुए
ज़फ़र मुरादाबादी
हर्फ़-ए-तदबीर न था हर्फ़-ए-दिलासा रौशन
ज़फ़र मुरादाबादी
बे-क़नाअत क़ाफ़िले हिर्स-ओ-हवा ओढ़े हुए
ज़फ़र मुरादाबादी
तब्-ए-रौशन को मिरी कुछ इस तरह भाई ग़ज़ल
ज़फ़र कलीम
नवा-ए-हक़ पे हूँ क़ातिल का डर अज़ीज़ नहीं
ज़फ़र कलीम
सर-बुरीदा हुआ मुक़ाबिल है
ज़फ़र इक़बाल ज़फ़र
जो बे-घर हैं उन्हें घर की दुआ देती हैं दीवारें
ज़फ़र इक़बाल ज़फ़र
जिस रोज़ से अपना मुझे इदराक हुआ है
ज़फ़र इक़बाल ज़फ़र
एक जुम्बिश में कट भी सकते हैं
ज़फ़र इक़बाल ज़फ़र
एक इक पल तिरा नायाब भी हो सकता है
ज़फ़र इक़बाल ज़फ़र
ज़िंदा रखता था मुझे शक्ल दिखा कर अपनी
ज़फ़र इक़बाल
तिरा चढ़ा हुआ दरिया समझ में आता है
ज़फ़र इक़बाल
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