हुआ Poetry (page 42)

दस्तार-ए-एहतियात बचा कर न आएगा

सुल्तान अख़्तर

अब तक लहू का ज़ाइक़ा ख़ंजर पे नक़्श है

सुल्तान अख़्तर

तुझ से बिछड़ूँ तो ये ख़दशा है अकेला हो जाऊँ

सुलेमान ख़ुमार

कुछ नहीं है तो ये अंदेशा ये डर कैसा है

सुलेमान ख़ुमार

कोई दिया किसी चौखट पे अब न जलने का

सुलेमान ख़ुमार

कल रात मेरे साथ अजब हादिसा हुआ

सुलेमान ख़ुमार

कचोके दिल को लगाता हुआ सा कुछ तो है

सुलेमान ख़ुमार

हया भी आँख में वारफ़्तगी भी

सुलेमान ख़ुमार

दश्त में ये जाँ-फ़ज़ाँ मंज़र कहाँ से आ गए

सुलेमान ख़ुमार

प्यार का दर्द का मज़हब नहीं होता कोई

सुलैमान अरीब

वो मिज़ाज दिल के बदल गए कि वो कारोबार नहीं रहा

सुलैमान अहमद मानी

तुझे क्या हुआ है बता ऐ दिल न सुकून है न क़रार है

सुलैमान अहमद मानी

क्यूँ और ज़ख़्म सीने पे खाओ हो दोस्तो

सुलैमान अहमद मानी

नंग-ए-एहसास है अंदोह-ए-ग़रीब-उल-वतनी

सुलैमान आसिफ़

कहाँ तेवर हैं उन में अब वो कल के

सुहैल काकोरवी

बरसों हुए उस से न कोई बात हुई रात

सुहैल काकोरवी

ये राज़ उस ने छुपाया है ख़ुश-बयानी से

सुहैल अख़्तर

जब कोई आलम-ए-शुहूद न था

सुहैल अख़्तर

दस्त-बरदार हुआ मैं भी तलबगारी से

सुहैल अख़्तर

सफ़र करो तो इक आलम दिखाई देता है

सुहैल अहमद ज़ैदी

कुछ दफ़्न है और साँस लिए जाता है

सुहैल अहमद ज़ैदी

कुछ दफ़्न है और साँस लिए जाता है

सुहैल अहमद ज़ैदी

जैसा हमें गुमान था वैसा नहीं रहा

सुहैल अहमद ज़ैदी

गए मौसमों को भुला देंगे हम

सुहैल अहमद ज़ैदी

दुनिया के कुछ न कुछ तो तलबगार से रहे

सुहैल अहमद ज़ैदी

दुनिया के कुछ न कुछ तो तलबगार से रहे

सुहैल अहमद ज़ैदी

शौक़-ए-बुतान-ए-अंजुमन-आरा लिए हुए

सुहा मुजद्ददी

जो कुछ हुआ सो हुआ अब सवाल ही क्या है

सुहा मुजद्ददी

ज़ब्त की क़ैद-ए-सख़्त ने हम को रिहा नहीं किया

सूफ़िया अनजुम ताज

वो एक लड़की जो ख़ंदा-लब थी न जाने क्यूँ चश्म-तर गई वो

सूफ़िया अनजुम ताज

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