हुआ Poetry (page 43)

साज़ के मौजों पे नग़्मों की सवारी मैं थी

सूफ़िया अनजुम ताज

ख़ुद-कुशी

सूफ़ी तबस्सुम

वो मुझ से हुए हम-कलाम अल्लाह अल्लाह

सूफ़ी तबस्सुम

वफ़ा की आख़िरी मंज़िल भी आ रही है क़रीब

सूफ़ी तबस्सुम

तू ने कुछ भी न कहा हो जैसे

सूफ़ी तबस्सुम

तू ने कुछ भी न कहा हो जैसे

सूफ़ी तबस्सुम

सुकून-ए-क़ल्ब ओ शकेब-ए-नज़र की बात करो

सूफ़ी तबस्सुम

क्या हुआ जो सितारे चमकते नहीं दाग़ दिल के फ़रोज़ाँ करो दोस्तो

सूफ़ी तबस्सुम

कुछ और गुमरही-ए-दिल का राज़ क्या होगा

सूफ़ी तबस्सुम

ख़ामोशी कलाम हो गई है

सूफ़ी तबस्सुम

हुस्न मजबूर-ए-जफ़ा है शायद

सूफ़ी तबस्सुम

हुस्न को जो मंज़ूर हुआ

सूफ़ी तबस्सुम

अगरचे आँख बहुत शोख़ियों की ज़द में रही

सूफ़ी तबस्सुम

आँखें खुली थीं सब की कोई देखता न था

सूफ़ी तबस्सुम

तुम न घबराओ मिरे ज़ख़्म-ए-जिगर को देख कर

सुदर्शन फ़ाकिर

किसी रंजिश को हवा दो कि मैं ज़िंदा हूँ अभी

सुदर्शन फ़ाकिर

इन्द्र-धनुष बन जाएँ

सुबोध लाल साक़ी

चुनाव

सुबोध लाल साक़ी

ये भी हुआ कि फ़ाइलों के दरमियाँ मिलीं

सुबोध लाल साक़ी

लम्बी ख़ामोशी की साज़िश को हराए कोई

सुबोध लाल साक़ी

हम ने ख़तरा मोल लिया नादानी में

सुबोध लाल साक़ी

सिलसिला ख़त्म कर चले आए

सुभाष पाठक ज़िया

इस का ग़म है कि मुझे वहम हुआ है शायद

सुबहान असद

बहते पानी की तरह मौज-ए-सदा की सूरत

सोज़ नजीबाबादी

शायद तुझ से मिलने की गुंजाइश है

सोनरूपा विशाल

अपनी मर्ज़ी का रुख़ मैं अपनाऊँ

सोनरूपा विशाल

वो नग़्मगी का ज़ाइक़ा उस की सदा में था

सोहन राही

कुछ इस तरह से है मेरे असर में तन्हाई

सिया सचदेव

आप की बस ये निशानी रह गई

सिया सचदेव

साग़र उठा के ज़ोहद को रद हम ने कर दिया

सिराजुद्दीन ज़फ़र

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