हुआ Poetry (page 41)

हुआ नहीं है अभी मुन्हरिफ़ ज़बान से वो

सुल्तान सुकून

सफ़ेद घोड़े पर सवार अजनबी

सुलतान सुबहानी

पतझड़ की हवा

सुलतान सुबहानी

नया हुक्म-नामा

सुलतान सुबहानी

लहू-रंग सय्याल रौशन भँवर

सुलतान सुबहानी

अगर मैं हँस पड़ूँ

सुलतान सुबहानी

वो आज मुझ से जब मिली तो धुँद छट गई

सुलतान सुबहानी

कोई भी बात न थी वारदात से पहले

सुलतान सुबहानी

लिख रहा हूँ हर्फ़-ए-हक़ हर्फ़-ए-वफ़ा किस के लिए

सुलतान रशक

ख़ुशियाँ न छोड़ अपने लिए ग़म तलब न कर

सुलतान रशक

जो कश्मकश थी तिरा इंतिज़ार करते हुए

सुलतान निज़ामी

झिजक रहा हूँ उसे आश्कार करते हुए

सुलतान निज़ामी

बाहर हिसार-ए-ग़म से फ़क़त देखने में था

सुलतान निज़ामी

सफ़र सफ़र मिरे क़दमों से जगमगाया हुआ

सुल्तान अख़्तर

फिर भी हम लोग वहाँ जीते हैं जीने की तरह

सुल्तान अख़्तर

हर एक दास्ताँ तुझ से शुरूअ होती है

सुल्तान अख़्तर

तिलिस्म-ख़ाना-ए-दिल में है चार-सू रौशन

सुल्तान अख़्तर

तिलिस्म-ए-कार-ए-जहाँ का असर तमाम हुआ

सुल्तान अख़्तर

तन्हाइयों की बर्फ़ थी बिस्तर पे जा-ब-जा

सुल्तान अख़्तर

तन्हाई की ख़लीज है यूँ दरमियान में

सुल्तान अख़्तर

सिलसिला मेरे सफ़र का कभी टूटा ही नहीं

सुल्तान अख़्तर

सरसब्ज़ मौसमों का असर ले गया कोई

सुल्तान अख़्तर

सब का चेहरा पस-ए-दीवार-ए-अना रहता है

सुल्तान अख़्तर

मुसीबत में भी ग़ैरत-आश्ना ख़ामोश रहती है

सुल्तान अख़्तर

मिरी क़दीम रिवायत को आज़माने लगे

सुल्तान अख़्तर

मैं लड़खड़ाया तो मुझ को गले लगाने लगे

सुल्तान अख़्तर

कोई भी शहर में खुल कर न बग़ल-गीर हुआ

सुल्तान अख़्तर

जिस को क़रीब पाया उसी से लिपट गए

सुल्तान अख़्तर

हरीफ़-ए-वक़्त हूँ सब से जुदा है राह मिरी

सुल्तान अख़्तर

हर इक लम्हा हमें हम से जुदा करती हुई सी

सुल्तान अख़्तर

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