प्रेम Poetry (page 26)

कशिश से दिल की उस अबरू-कमाँ को हम रखा बहला

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

कशिश से दिल की उस अबरू कमाँ को हम रखा बहला

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

जुम्बिश-ए-दिल नहीं बेजा तू किधर भूला है

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

जो मिरे हम-अस्र हम-सोहबत थे सो सब मर गए

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

इश्क़ नहीं कोई नहंग है यारो

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

एक तो तिरी दौलत था ही दिल ये सौदाई

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

देखते सज्दे में आता है जो करता है निगाह

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

दर्द-ए-दिल मेरी आह से पूछो

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

औक़ात-ए-शैख़ गो कि सुजूद ओ क़याम है

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

आगे क्या तुम सा जहाँ में कोई महबूब न था

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

आब-ए-हयात जा के किसू ने पिया तो क्या

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

अपने ज़ौक़-ए-दीद को अब कारगर पाता हूँ मैं

शैदा अम्बालवी

रदीफ़ क़ाफ़िया बंदिश ख़याल लफ़्ज़-गरी

शहज़ाद क़ैस

मिरे रोग का न मलाल कर मिरे चारा-गर

शहज़ाद नय्यर

सोचिए गर उसे हर-नफ़स मौत है कुछ मुदावा भी हो बे-हिसी के लिए

शहज़ाद अंजुम बुरहानी

सोचिए गर उसे हर नफ़स मौत है कुछ मुदावा भी हो बे-हिसी के लिए

शहज़ाद अंजुम बुरहानी

न पूछ मेरी कहानी कहाँ से निकली है

शहज़ाद अंजुम बुरहानी

लबों पे आ के रह गईं शिकायतें कभी कभी

शहज़ाद अहमद

कैसे गुज़र सकेंगे ज़माने बहार के

शहज़ाद अहमद

ये जगह अहल-ए-जुनूँ अब नहीं रहने वाली

शहरयार

किस फ़िक्र किस ख़याल में खोया हुआ सा है

शहरयार

जहाँ पे तेरी कमी भी न हो सके महसूस

शहरयार

बे-ताब हैं और इश्क़ का दावा नहीं हम को

शहरयार

ब-नाम-ए-इश्क़ इक एहसान सा अभी तक है

शहराम सर्मदी

हुवल-इश्क़

शहराम सर्मदी

वो एक लम्हा-ए-रफ़्ता भी क्या बुला लाया

शहराम सर्मदी

रह-ए-वफ़ा में रहे ये निशान-ए-ख़ातिर बस

शहराम सर्मदी

रगों में रात से ये ख़ून सा रवाँ है क्या

शहराम सर्मदी

जो इस बरस नहीं अगले बरस में दे दे तू

शहराम सर्मदी

हम अपने इश्क़ की बाबत कुछ एहतिमाल में हैं

शहराम सर्मदी

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