प्रेम Poetry (page 67)

ये सारे ख़ूबसूरत जिस्म अभी मर जाने वाले हैं

फ़रहत एहसास

यही हिसाब-ए-मोहब्बत दोबारा कर के लाओ

फ़रहत एहसास

उस को है इश्क़ बताना भी नहीं चाहता है

फ़रहत एहसास

उम्र बे-वज्ह गुज़ारे भी नहीं जा सकते

फ़रहत एहसास

तुम कुछ भी करो होश में आने के नहीं हम

फ़रहत एहसास

साहिब-ए-इश्क़ अब इतनी सी तो राहत मुझे दे

फ़रहत एहसास

सब ने'मतें हैं शहर में इंसान ही नहीं

फ़रहत एहसास

सब लज़्ज़तें विसाल की बेकार करते हो

फ़रहत एहसास

रूह को तो इक ज़रा सी रौशनी दरकार है

फ़रहत एहसास

रौनक़-ए-ज़हर हो चुका मिरा दिल

फ़रहत एहसास

मुसलसल अश्क-बारी हो रही है

फ़रहत एहसास

मोहब्बत का सिला-कार-ए-मोहब्बत से नहीं मिलता

फ़रहत एहसास

मिरे शे'रों में फ़नकारी नहीं है

फ़रहत एहसास

मैं तमाम गर्द-ओ-ग़ुबार हूँ मुझे मेरी सूरत-ए-हाल दे

फ़रहत एहसास

महफ़िल में अब के आओ तो ऐसी ख़ता न हो

फ़रहत एहसास

कुछ बताता नहीं क्या सानेहा कर बैठा है

फ़रहत एहसास

ख़िलाफ़-ए-गर्दिश-ए-मा'मूल होना चाहता हूँ

फ़रहत एहसास

ख़ाक ओ ख़ूँ की नई तंज़ीम में शामिल हो जाओ

फ़रहत एहसास

कभी हँसते नहीं कभी रोते नहीं कभी कोई गुनाह नहीं करते

फ़रहत एहसास

काबा-ए-दिल दिमाग़ का फिर से ग़ुलाम हो गया

फ़रहत एहसास

जो इश्क़ चाहता है वो होना नहीं है आज

फ़रहत एहसास

जिस्म की क़ैद से सब रंग तुम्हारे निकल आए

फ़रहत एहसास

जब उस को देखते रहने से थकने लगता हूँ

फ़रहत एहसास

इश्क़ में कितने बुलंद इम्कान हो जाते हैं हम

फ़रहत एहसास

हम न प्यासे हैं न पानी के लिए आए हैं

फ़रहत एहसास

हम को बरा-ए-दुनिया बे-जान कर दिया है

फ़रहत एहसास

घर में चीज़ें बढ़ रही हैं ज़िंदगी कम हो रही है

फ़रहत एहसास

दिन ने इतना जो मरीज़ाना बना रक्खा है

फ़रहत एहसास

दबा पड़ा है कहीं दश्त में ख़ज़ाना मिरा

फ़रहत एहसास

बे-रंग बड़े शहर की हस्ती भी वहीं थी

फ़रहत एहसास

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