प्रेम Poetry (page 89)

हर इश्क़ के मंज़र में था इक हिज्र का मंज़र

अक़ील अब्बास जाफ़री

एहसास-ए-ज़ियाँ हम में से अक्सर में नहीं था

अक़ील अब्बास जाफ़री

सारे कुश्तों से जुदा ढंग इज़्तिराब-ए-दिल का है

अनवरी जहाँ बेगम हिजाब

कट चुकी थी ये नज़र सब से बहुत दिन पहले

अनवर शऊर

पागलों की मद्ह में

अनवर सेन रॉय

वो पर्दे से निकल कर सामने जब बे-हिजाब आया

अनवर सहारनपुरी

रंगीं बना के दामन-ए-ज़ख़्म-ए-जिगर को मैं

अनवर सहारनपुरी

क्यूँ ख़फ़ा हम से हो ख़ता क्या है

अनवर सहारनपुरी

दीवार पर लिखा न पढ़ो और ख़ुश रहो

अनवर सदीद

रहते हुए क़रीब जुदा हो गए हो तुम

अनवर साबरी

न तन्हा नस्तरीन ओ नस्तरन से इश्क़ है मुझ को

अनवर साबरी

वहाँ ज़ेर-ए-बहस आते ख़त-ओ-ख़ाल ओ ख़ू-ए-ख़ूबाँ

अनवर मसूद

दर्द उरूज पर आ जाए तो

अनवार फ़ितरत

मोहब्बत हो तो बर्क़-ए-जिस्म-ओ-जाँ हो

अनवर देहलवी

हो रहा है टुकड़े टुकड़े दिल मेरे ग़म-ख़्वार का

अनवर देहलवी

अश्क बेताब व निगह बे-बाक व चश्म-ए-तर ख़राब

अनवर देहलवी

अब अपना हाल हम उन्हें तहरीर कर चुके

अनवर देहलवी

आँखें दिखाईं ग़ैर को मेरी ख़ता के साथ

अनवर देहलवी

हमारे इश्क़ और उन के तग़ाफ़ुल का ये आलम है

अनवर बरेलवी

ये सरकारी शिफ़ा-ख़ाने में जो बीमार लेटे हैं

अनवर बरेलवी

दीदा-ए-तर ने अजब जल्वागरी देखी है

अनवर मोअज़्ज़म

किस ने आबाद किया है मरी वीरानी को

अंजुम सलीमी

ये मोहब्बत का जो अम्बार पड़ा है मुझ में

अंजुम सलीमी

सख़्त मुश्किल में किया हिज्र ने आसान मुझे

अंजुम सलीमी

खींचा हुआ है गर्दिश-ए-अफ़्लाक ने मुझे

अंजुम सलीमी

इक दूजे को देर से समझा देर से यारी की

अंजुम सलीमी

दर्द-ए-विरासत पा लेने से नाम नहीं चल सकता

अंजुम सलीमी

हम से बात में पेच न डाल

अंजुम रूमानी

वाइ'ज़ की कड़वी बातों को कब ध्यान में अपने लाते हैं

अंजुम मानपुरी

चाँद हम दोनों से मुशाबह है

अंजुम ख़लीक़

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