जान Poetry (page 20)

जीना मरना दोनों मुहाल

सरस्वती सरन कैफ़

न आसमान है साकित न दिल ठहरता है

साक़िब लखनवी

बस ऐ फ़लक नशात-ए-दिल का इंतिक़ाम हो चुका

साक़िब लखनवी

तू जान-ए-मोहब्बत है मगर तेरी तरफ़ भी

साक़ी फ़ारुक़ी

मैं अपनी आँखों से अपना ज़वाल देखता हूँ

साक़ी फ़ारुक़ी

मुहासबा

साक़ी फ़ारुक़ी

मस्ताना हीजड़ा

साक़ी फ़ारुक़ी

ख़ाली बोरे में ज़ख़्मी बिल्ला

साक़ी फ़ारुक़ी

हमल-सरा

साक़ी फ़ारुक़ी

फैंटेसी

साक़ी फ़ारुक़ी

एक सुअर से

साक़ी फ़ारुक़ी

डस्टबिन

साक़ी फ़ारुक़ी

अलकुबड़े

साक़ी फ़ारुक़ी

वो आग हूँ कि नहीं चैन एक आन मुझे

साक़ी फ़ारुक़ी

तुझे ख़बर है तुझे याद क्यूँ नहीं करते

साक़ी फ़ारुक़ी

सुर्ख़ चमन ज़ंजीर किए हैं सब्ज़ समुंदर लाया हूँ

साक़ी फ़ारुक़ी

शहर का शहर हुआ जान का प्यासा कैसा

साक़ी फ़ारुक़ी

सब कुछ न कहीं सोग मनाने में चला जाए

साक़ी फ़ारुक़ी

पाँव मारा था पहाड़ों पे तो पानी निकला

साक़ी फ़ारुक़ी

मिट्टी थी ख़फ़ा मौज उठा ले गई हम को

साक़ी फ़ारुक़ी

जान प्यारी थी मगर जान से बे-ज़ारी थी

साक़ी फ़ारुक़ी

कुछ भी समझ न पाओगे मेरे बयान से

संजय मिश्रा शौक़

हम तो यूँ उलझे कि भूले आप ही अपना ख़याल

समीना राजा

कहो तो आज बता दें तुम्हें हक़ीक़त भी

सलमान अख़्तर

ऐ जान-ए-जाँ तिरे मिज़ाज का फ़लक भी ख़ूब है

सलमा शाहीन

मेरी अर्ज़ानी से मुझ को वो निकालेगा मगर

सालिम सलीम

रौशन सुकूत सब उसी शो'ला-बयाँ से है

सलीम शाहिद

फिर जी उठे हैं जिस से वो इम्कान तुम नहीं

सलीम कौसर

मैं रात हव्वा

सलीम फ़िगार

फ़स्ल-ए-ख़िज़ाँ में शाख़ से पत्ता निकाल दे

सलीम फ़िगार

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