जान Poetry (page 22)

आओ कि कोई ख़्वाब बुनें

साहिर लुधियानवी

मिलती है ज़िंदगी में मोहब्बत कभी कभी

साहिर लुधियानवी

बरबाद-ए-मोहब्बत की दुआ साथ लिए जा

साहिर लुधियानवी

तेरे महल में कैसे बसर हो इस की तो गीराई बहुत है

साहिर होशियारपुरी

अज़ल से हम-नफ़सी है जो जान-ए-जाँ से हमें

साहिर देहल्वी

अयाँ 'अलीम' से है जिस्म-ओ-जान का इल्हाक़

साहिर देहल्वी

आते हुए इस तन में न जाते हुए तन से

साहिर देहल्वी

जुनूँ के जोश में जिस ने मोहब्बत को हुनर जाना

साहिर देहल्वी

जसद ने जान से पूछा कि क़ल्ब-ए-बे-रिया क्या है

साहिर देहल्वी

इस जिस्म की है पाँच अनासिर से बनावट

साहिर देहल्वी

चश्म-ए-मस्त-ए-साक़ी से दिल हुआ ख़राब-आबाद

साहिर देहल्वी

चार उंसुर से बना है जिस्म-ए-पाक

साहिर देहल्वी

अयाँ हो रंग में और मिस्ल-ए-बू गुल में निहाँ भी हो

साहिर देहल्वी

उसे यक़ीं मिरी बातों पे अब न आएगा

साहिबा शहरयार

मुझ को वीरान सी रातों में जगाने वाले

साहिबा शहरयार

मोहलत न दे ज़रा भी मुझे मेरी जान खींच

सहबा वहीद

जवाज़-ए-आब-ओ-ताब अब गुलाब के लिए नहीं

सहबा वहीद

सवाल-ए-सुब्ह-ए-चमन ज़ुल्मत-ए-ख़िज़ाँ से उठा

सहबा अख़्तर

मुझ पे ऐसा कोई शे'र नाज़िल न हो

सहबा अख़्तर

दास्ताँ क्या थी और क्या बना दी गई

सहर महमूद

महसूस क्यूँ न हो मुझे बेगानगी बहुत

सहर अंसारी

घर के बारे में यही जान सका हूँ अब तक

सग़ीर मलाल

कैसे जानूँ कि जहाँ ख़्वाब-नुमा होता है

सग़ीर मलाल

एक वा'दा है किसी का जो वफ़ा होता नहीं

साग़र सिद्दीक़ी

इक अजनबी ख़याल में ख़ुद से जुदा रहा

साग़र मेहदी

इंजीनियर करेंगे अगर डॉक्टर का काम

साग़र ख़य्यामी

रोटी कपड़ा और मकान

साग़र ख़य्यामी

दुम

साग़र ख़य्यामी

दिल्ली की बस

साग़र ख़य्यामी

अलाउद्दीन का तरबूज़

साग़र ख़य्यामी

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