जान Poetry (page 42)

ये तमन्ना है कि इस तरह मुसलमाँ होता

फ़ना बुलंदशहरी

वो और होंगे जिन को हरम की तलाश है

फ़ना बुलंदशहरी

तुझे ढूँढती हैं नज़रें मुझे इक झलक दिखा जा

फ़ना बुलंदशहरी

मुझ को दुनिया के हर इक ग़म से छुड़ा रक्खा है

फ़ना बुलंदशहरी

मक़ाम-ए-होश से गुज़रा मकाँ से ला-मकाँ पहुँचा

फ़ना बुलंदशहरी

किस तरह छोड़ दूँ ऐ यार मैं चाहत तेरी

फ़ना बुलंदशहरी

जल्वा जो तिरे रुख़ का एहसास में ढल जाए

फ़ना बुलंदशहरी

हुस्न-ए-बुताँ का इश्क़ मेरी जान हो गया

फ़ना बुलंदशहरी

ग़म-ए-दुनिया ग़म-ए-हस्ती ग़म-ए-उल्फ़त ग़म-ए-दिल

फ़ना बुलंदशहरी

दुनिया के हर ख़याल से बेगाना कर दिया

फ़ना बुलंदशहरी

अँधेरे लाख छा जाएँ उजाला कम नहीं होता

फ़ना बुलंदशहरी

ऐ सनम तुझ को हम भुला न सके

फ़ना बुलंदशहरी

ग़ज़लें लिख लिख पागल होने वाला हूँ

फख़्र अब्बास

चेहरे से कब अयाँ है मिरे इज़्तिरार भी

फख़्र अब्बास

बिजली सी इक और गिरा दी ज़ालिम ने

फख़्र अब्बास

लगा कि जैसे किसी काँपते हिरन को छुआ

फ़ैज़ ख़लीलाबादी

मिरी जान आज का ग़म न कर कि न जाने कातिब-ए-वक़्त ने

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

इन में लहू जला हो हमारा कि जान ओ दिल

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

याद

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

शीशों का मसीहा कोई नहीं

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

मिरी जाँ अब भी अपना हुस्न वापस फेर दे मुझ को

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

मेरे नदीम!

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

हम तो मजबूर-ए-वफ़ा हैं

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

हज़र करो मिरे तन से

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

दुआ

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

दो इश्क़

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

चंद रोज़ और मिरी जान

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

ब्लैक-आउट

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

अगस्त-1952

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

आख़िरी ख़त

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

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