चलो Poetry (page 12)

हाथ आए तो वही दामन-ए-जानाँ हो जाए

फ़िराक़ गोरखपुरी

ग़म तिरा जल्वा-गह-ए-कौन-ओ-मकाँ है कि जो था

फ़िराक़ गोरखपुरी

का'बे में हो या बुत-ख़ाने में होने को तो सर ख़म होता है

फ़िगार उन्नावी

काबा भी घर अपना है सनम-ख़ाना भी अपना

फ़िगार उन्नावी

ज़मज़मा-ए-आह-ओ-फ़ुग़ाँ दूर तक

फ़ाज़िल अंसारी

ये दौर कैसा है या-इलाही कि दोस्त दुश्मन से कम नहीं है

फ़ाज़िल अंसारी

तिरा जल्वा शाम-ओ-सहर देखते हैं

फ़रहत कानपुरी

बीमार हो गया हूँ शिफा-ख़ाना चाहिए

फ़रहत एहसास

क्या बताएँ क्या कल शब आख़िरी पहर देखा

फ़रहान सालिम

शिकायत हम नहीं करते रिआ'यत वो नहीं करते

फ़रह इक़बाल

ताकीद है कि दीदा-ए-दिल वा करे कोई

फ़ानी बदायुनी

माया-ए-नाज़-ए-राज़ हैं हम लोग

फ़ानी बदायुनी

किसी के एक इशारे में किस को क्या न मिला

फ़ानी बदायुनी

जीने की है उम्मीद न मरने का यक़ीं है

फ़ानी बदायुनी

हो काश वफ़ा वादा-ए-फ़र्दा-ए-क़यामत

फ़ानी बदायुनी

वो आँख क्या जो आरिज़ ओ रुख़ पर ठहर न जाए

फ़ना निज़ामी कानपुरी

जल्वा हो तो जल्वा हो पर्दा हो तो पर्दा हो

फ़ना निज़ामी कानपुरी

या रब मिरी हयात से ग़म का असर न जाए

फ़ना निज़ामी कानपुरी

ऐ हुस्न ज़माने के तेवर भी तो समझा कर

फ़ना निज़ामी कानपुरी

ये तमन्ना है कि इस तरह मुसलमाँ होता

फ़ना बुलंदशहरी

तेरी नज़रों पे तसद्दुक़ आज अहल-ए-होश हैं

फ़ना बुलंदशहरी

मक़ाम-ए-होश से गुज़रा मकाँ से ला-मकाँ पहुँचा

फ़ना बुलंदशहरी

कहीं सुकूँ न मिला दिल को बज़्म-ए-यार के बा'द

फ़ना बुलंदशहरी

जब तक मिरे होंटों पे तिरा नाम रहेगा

फ़ना बुलंदशहरी

हरम है क्या चीज़ दैर क्या है किसी पे मेरी नज़र नहीं है

फ़ना बुलंदशहरी

है वज्ह कोई ख़ास मिरी आँख जो नम है

फ़ना बुलंदशहरी

ऐ सनम तुझ को हम भुला न सके

फ़ना बुलंदशहरी

कोई तसव्वुर में जल्वा-गर है बहार दिल में समा रही है

फ़ैज़ी निज़ाम पुरी

सुरुद-ए-शबाना

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

ज़िंदगी से मुकालिमा

फ़हीम शनास काज़मी

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