जिन्न Poetry (page 37)

ग़म की गर्मी से दिल पिघलते रहे

अर्श सिद्दीक़ी

मैं हूँ ऐसे बिखरा सा

अर्श सहबाई

ये दौर-ए-ख़िरद है दौर-ए-जुनूँ इस दौर में जीना मुश्किल है

अर्श मलसियानी

नैरंगी-ए-बहार-ओ-ख़िज़ाँ देखते रहे

अर्श मलसियानी

इश्क़-ए-बुताँ का ले के सहारा कभी कभी

अर्श मलसियानी

तह-ए-अफ़्लाक ही सब कुछ नहीं है

अरमान नज्मी

छुपाए दिल में हम अक्सर तिरी तलब भी चले

आरिफ़ अब्दुल मतीन

मुझे महरूमियों का ग़म नहीं है

आरिफ़ अब्बास

जल्वे दिखाए यार ने अपनी हरीम-ए-नाज़ में

अनवर सहारनपुरी

जब फ़स्ल-ए-बहाराँ आती है शादाब गुलिस्ताँ होते हैं

अनवर सहारनपुरी

ज़ुल्मतों में रौशनी की जुस्तुजू करते रहो

अनवर साबरी

तलख़ाबा-ए-ग़म ख़ंदा-जबीं हो के पिए जा

अनवर साबरी

इस वास्ते दामन चाक किया शायद ये जुनूँ काम आ जाए

अनवर मिर्ज़ापुरी

आए हैं समझाने लोग

अनवर जमाल अनवर

नए दिनों के नए सहीफ़ों में ज़िक्र-ए-मेहर-ओ-वफ़ा नहीं है

अनवर अलीमी

दीदा-ए-तर ने अजब जल्वागरी देखी है

अनवर मोअज़्ज़म

ग़म सहें या ख़ुशी को प्यार करें

अंजुम सिद्दीक़ी

मिरे जुनूँ को हवस में शुमार कर लेगा

अंजुम ख़लीक़

मिरे जुनूँ को हवस में शुमार कर लेगा

अंजुम ख़लीक़

रक़्स-ए-जुनूँ की गर्मी-ए-तासीर देखना

अंजुम इरफ़ानी

हम से क्या ख़ाक के ज़र्रों ही से पूछा होता

अंजुम आज़मी

फ़रेब ग़म ही सही दिल ने आरज़ू कर ली

अंजुम आज़मी

वो ग़ुंचा हूँ जो बिन खिले मुरझाए चमन में

अनीसा बेगम

मोहिब्बान-ए-वतन का नारा

आनंद नारायण मुल्ला

दिल की दिल को ख़बर नहीं मिलती

आनंद नारायण मुल्ला

जो पूछते हैं कि ये इश्क़-ओ-आशिक़ी क्या है

अमजद नजमी

जाएँ कहाँ हम आप का अरमाँ लिए हुए

अमजद नजमी

शाम ढले जब बस्ती वाले लौट के घर को आते हैं

अमजद इस्लाम अमजद

कहने सुनने से मिरी उन की अदावत हो गई

अमीरुल्लाह तस्लीम

ग़ैब से सहरा-नवरदों का मुदावा हो गया

अमीरुल्लाह तस्लीम

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