जिगर Poetry (page 21)

देने वाले ये ज़िंदगी दी है

ब्रहमा नन्द जलीस

अब इश्क़ रहा न वो जुनूँ है

बिस्मिल सईदी

क़ासिद तू ख़त को लाया है क्यूँकर खुला हुआ

बिल्क़ीस बेगम

देता था जो साया वो शजर काट रहा है

बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन

किस गुल के तसव्वुर में है ऐ लाला जिगर-ख़ूँ

भारतेंदु हरिश्चंद्र

फिर आई फ़स्ल-ए-गुल फिर ज़ख़्म-ए-दिल रह रह के पकते हैं

भारतेंदु हरिश्चंद्र

ग़ज़ब है सुर्मा दे कर आज वो बाहर निकलते हैं

भारतेंदु हरिश्चंद्र

दिल आतिश-ए-हिज्राँ से जलाना नहीं अच्छा

भारतेंदु हरिश्चंद्र

बैठे जो शाम से तिरे दर पे सहर हुई

भारतेंदु हरिश्चंद्र

अदाएँ देखने बैठे हो क्या आईने में अपनी

बेख़ुद देहलवी

वो देखते जाते हैं कनखियों से इधर भी

बेख़ुद देहलवी

उठे तिरी महफ़िल से तो किस काम के उठ्ठे

बेख़ुद देहलवी

दिल चुरा ले गई दुज़्दीदा-नज़र देख लिया

बेख़ुद देहलवी

दे मोहब्बत तो मोहब्बत में असर पैदा कर

बेख़ुद देहलवी

बेवफ़ा कहने से क्या वो बेवफ़ा हो जाएगा

बेख़ुद देहलवी

अदू के ताकने को तुम इधर देखो उधर देखो

बेख़ुद देहलवी

अब इस से क्या तुम्हें था या उमीद-वार न था

बेख़ुद देहलवी

जिस में सौदा नहीं वो सर ही नहीं

बेखुद बदायुनी

इक बे-वफ़ा को प्यार किया हाए क्या किया

बहज़ाद लखनवी

इक बेवफ़ा को दर्द का दरमाँ बना लिया

बहज़ाद लखनवी

चश्म-ए-हसीं में है न रुख़-ए-फ़ित्ना-गर में है

बहज़ाद लखनवी

यूँ गुलशन-ए-हस्ती की माली ने बिना डाली

बेदम शाह वारसी

तूर वाले तिरी तनवीर लिए बैठे हैं

बेदम शाह वारसी

पर्दे उठे हुए भी हैं उन की इधर नज़र भी है

बेदम शाह वारसी

न सुनो मेरे नाले हैं दर्द-भरे दार-ओ-असरे आह-ए-सहरे

बेदम शाह वारसी

कभी यहाँ लिए हुए कभी वहाँ लिए हुए

बेदम शाह वारसी

अहसन तक़्वीम

बेबाक भोजपुरी

रौनक़ फ़रोग़-ए-दर्द से कुछ अंजुमन में है

बेबाक भोजपुरी

फ़स्ल-ए-बहार जाने ये क्या गुल कतर गई

बेबाक भोजपुरी

ऐ जुनूँ हाथ के चलते ही मचल जाऊँगा

बयान मेरठी

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