शरीर Poetry (page 27)

एक ज़ाती नज़्म

ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर

सब रंग ना-तमाम हों हल्का लिबास हो

ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर

गलियों की उदासी पूछती है घर का सन्नाटा कहता है

ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर

फ़सील-ए-जिस्म की ऊँचाई से उतर जाएँ

ग़ुलाम हुसैन अयाज़

पत्थर

ग़ज़नफ़र

ये तमन्ना नहीं कि मर जाएँ

ग़ज़नफ़र

यक़ीन जानिए इस में कोई करामत है

ग़ज़नफ़र

थकन ग़ालिब है दम टूटे हुए हैं

ग़नी एजाज़

दर्द जब दस्तरस-ए-चारागराँ से निकला

ग़ालिब अयाज़

जला है जिस्म जहाँ दिल भी जल गया होगा

ग़ालिब

हर एक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है

ग़ालिब

वो टुकड़ा रात का बिखरा हुआ सा

गौतम राजऋषि

साँप! आ काट मुझे

गौहर नौशाही

एहसास-ए-जुर्म जान का दुश्मन है 'जाफ़री'

फ़ुज़ैल जाफ़री

साहब दिलों से राह में आँखें मिला के देख

फ़ुज़ैल जाफ़री

घर से बे-ज़ार हूँ कॉलेज में तबीअ'त न लगे

फ़ुज़ैल जाफ़री

दिल मुतमइन है हर्फ़-ए-वफ़ा के बग़ैर भी

फ़ुज़ैल जाफ़री

आख़िर चराग़-ए-दर्द-ए-मोहब्बत बुझा दिया

फ़ुज़ैल जाफ़री

तमाम जिस्म की परतें जुदा जुदा करके

फ़िज़ा कौसरी

तमाम जिस्म की परतें जुदा जुदा करके

फ़िज़ा कौसरी

शाम-ए-अयादत

फ़िराक़ गोरखपुरी

परछाइयाँ

फ़िराक़ गोरखपुरी

हिण्डोला

फ़िराक़ गोरखपुरी

रातों के ख़ौफ़ दिन की उदासी ने क्या दिया

फ़ज़्ल ताबिश

न कर शुमार कि हर शय गिनी नहीं जाती

फ़ज़्ल ताबिश

मिलों के शहर में घटता हुआ दिन सोचता होगा

फ़ज़्ल ताबिश

हर इक दरवाज़ा मुझ पर बंद होता

फ़ज़्ल ताबिश

मिलने का भी आख़िर कोई इम्कान बनाते

फ़ाज़िल जमीली

ख़्वाब में देख रहा हूँ कि हक़ीक़त में उसे

फ़ाज़िल जमीली

ख़बर मुझ को नहीं मैं जिस्म हूँ या कोई साया हूँ

फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी

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