जुदाई Poetry (page 2)

वो हम से क्यूँ अलग था क्यूँ दुखी था

तसव्वुर ज़ैदी

बंद दरीचों के कमरे से पूर्वा यूँ टकराई है

ताज सईद

मकाँ से होगा कभी ला-मकान से होगा

तैमूर हसन

ये एक बात समझने में रात हो गई है

तहज़ीब हाफ़ी

खोता ही नहीं है हवस-ए-मतअम-ओ-मलबस

ताबाँ अब्दुल हई

मुझ से क्या पूछते हो दाग़ हैं दिल में कितने

तअशशुक़ लखनवी

फिर उम्र-भर की नाला-सराई का वक़्त है

सय्यद तम्जीद हैदर तम्जीद

तिरी जुदाई में ये दिल बहुत दुखी तो नहीं

सय्यद काशिफ़ रज़ा

आप बुलाएँ हम न आएँ ऐसी कोई बात नहीं

सय्यद आरिफ़ अली

ज़ेब उस को ये आशोब-ए-गदाई नहीं देता

सय्यद अमीन अशरफ़

बुलबुल ओ परवाना

सुरूर जहानाबादी

बरसों हुए उस से न कोई बात हुई रात

सुहैल काकोरवी

शाम-ए-फ़िराक़ अपनी फ़रोज़ाँ न कर सके

सुग़रा सब्ज़वारी

चंद रोज़ और मिरी जान फ़क़त चंद ही रोज़

सूफ़ी तबस्सुम

ये आज आए हैं किस अजनबी से देस में हम

सूफ़ी तबस्सुम

उठी है जो क़दमों से वो दामन से अड़ी है

सूफ़ी तबस्सुम

कुछ और गुमरही-ए-दिल का राज़ क्या होगा

सूफ़ी तबस्सुम

ग़म-नसीबों को किसी ने तो पुकारा होगा

सूफ़ी तबस्सुम

मैं जुदाई का मुक़र्रर सिलसिला हो जाऊँगा

सुबोध लाल साक़ी

मैं जुदाई का मुक़र्रर सिलसिला हो जाऊँगा

सुबोध लाल साक़ी

मिला-दिला सही इक ख़ुश्क हार बाक़ी है

सिराज लखनवी

रोज़ा-दारान-ए-जुदाई कूँ ख़म-ए-अबरू-ए-यार

सिराज औरंगाबादी

पकड़ा हूँ किनारा-ए-जुदाई

सिराज औरंगाबादी

वहशत को मिरी देख कि मजनूँ ने कहा बस

सिराज औरंगाबादी

तिरी निगाह-ए-तलत्तुफ़ ने फ़ैज़ आम किया

सिराज औरंगाबादी

क़द तिरा सर्व-ए-रवाँ था मुझे मालूम न था

सिराज औरंगाबादी

मख़मूर चश्मों की तबरीद करने कूँ शबनम है सरदाब शोरों की मानिंद

सिराज औरंगाबादी

है जुम्बिश-ए-मिज़्गाँ में तिरी तीर की आवाज़

सिराज औरंगाबादी

भरा कमाल-ए-वफ़ा सें ख़याल का शीशा

सिराज औरंगाबादी

अव्वल सीं दिल मिरा जो गिरफ़्तार था सो है

सिराज औरंगाबादी

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