काम Poetry (page 11)

ज़िंदगी तुझ को कहीं पर तो ठहरना होगा

सिया सचदेव

बड़ों-बड़ों के क़दम डगमगाए जाते हैं

सिराज लखनवी

यूँ सुबुक-दोश हूँ जीने का भी इल्ज़ाम नहीं

सिराज लखनवी

ये वो आज़माइश-ए-सख़्त है कि बड़े बड़े भी निकल गए

सिराज लखनवी

मदद ऐ ख़याल-ए-माज़ी ज़रा आइना उठाना

सिराज लखनवी

दुनिया का न उक़्बा का कोई ग़म नहीं सहते

सिराज लखनवी

अच्छा क़िसास लेना फिर आह-ए-आतिशीं से

सिराज लखनवी

था बहाना मुझे ज़ंजीर के हिल जाने का

सिराज औरंगाबादी

तिरी निगाह-ए-तलत्तुफ़ ने फ़ैज़ आम किया

सिराज औरंगाबादी

सनम ख़ुश तबईयाँ सीखे हो तुम किन किन ज़रीफ़ों सीं

सिराज औरंगाबादी

क्या बला का है नशा इश्क़ के पैमाने में

सिराज औरंगाबादी

कौन कहता है जफ़ा करते हो तुम

सिराज औरंगाबादी

हमारा दिलबर-ए-गुलफ़म आया

सिराज औरंगाबादी

अमल सें मय-परस्तों के तुझे क्या काम ऐ वाइ'ज़

सिराज औरंगाबादी

लकड़ी की दो मेज़ें हैं इक लोहे की अलमारी है

सिदरा सहर इमरान

बे-ख़याली में कहा था कि शनासाई नहीं

सिदरा सहर इमरान

दिल ही गिर्दाब-ए-तमन्ना है यहीं डूबते हैं

सिद्दीक़ मुजीबी

अब यही बेहतर है नक़्श-ए-आब होने दे मुझे

सिद्दीक़ मुजीबी

हवा चली तो पसीना रगों में बैठ गया

सिद्दीक़ अफ़ग़ानी

कुछ ऐसी टूट के शहर-ए-जुनूँ की याद आई

सिद्दीक़ शाहिद

ग़म की भट्टी में ब-सद-शौक़ उतर जाऊँगा

श्याम सुन्दर नंदा नूर

तुम अपने मरीज़-ग़म-हिज्राँ की ख़बर लो

शऊर बलगिरामी

उस बेवफ़ा का शहर है और वक़्त-ए-शाम है

शुजा ख़ावर

'शुजा' मौत से पहले ज़रूर जी लेना

शुजा ख़ावर

उस बेवफ़ा का शहर है और वक़्त-ए-शाम है

शुजा ख़ावर

शिद्दत-ए-इंतिज़ार काम आई

शुजा ख़ावर

ख़ुदा ने चाहा तो सब इंतिज़ाम कर देंगे

शुजा ख़ावर

इस तरह पहुँचेगा कैसे पाया-ए-तकमील को

शुजा ख़ावर

इस ए'तिबार से बे-इंतिहा ज़रूरी है

शुजा ख़ावर

बिछड़ गए थे किसी रोज़ खेल खेल में हम

शोज़ेब काशिर

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