काम Poetry (page 23)

सर-ब-सर यार की मर्ज़ी पे फ़िदा हो जाना

रहमान फ़ारिस

ज़रा सी मश्क़ करे बे-ज़मीर बन जाए

रज़मी सिद्दीक़ी

दिल तो है एक मगर दर्द के ख़ाने हैं बहुत

रज़िया फ़सीह अहमद

तमाम रात तिरा इंतिज़ार होता रहा

रज़ी रज़ीउद्दीन

रैलियाँ ही रैलियाँ

रज़ा नक़वी वाही

यूँही ज़ालिम का रहा राज अगर अब के बरस

रज़ा मौरान्वी

मुझ को जो कहते हो म्याँ तुम हो कहाँ तुम हो कहाँ

रज़ा अज़ीमाबादी

जब उठे तेरे आस्ताने से

रज़ा अज़ीमाबादी

ऐ बुत-ए-ना-आश्ना कब तुझ से बेगाने हैं हम

रज़ा अज़ीमाबादी

दिल बता और क्या है होने को

रज़ा अमरोही

नक़ाब-ए-शब में छुप कर किस की याद आई समझते हैं

रविश सिद्दीक़ी

लगी है भीड़ बड़ा मय-कदे का नाम भी है

रविश सिद्दीक़ी

कहने को सब फ़साना-ए-ग़ैब-ओ-शुहूद था

रविश सिद्दीक़ी

न बुतों के न अब ख़ुदा के रहे

रौनक़ टोंकवी

उम्र भर पेश-ए-नज़र माह-ए-तमाम आते रहे

रौनक़ रज़ा

हमारे ख़्वाब हमारी पसंद होते गए

रौनक़ रज़ा

दरवाज़ा मायूस है शायद सोग में है अँगनाई बहुत

रौनक़ नईम

कोई ज़ख़्म खुला तो सहने लगे कोई टीस उठी लहराने लगे

रउफ़ रज़ा

लुभा रही तो है दुनिया चमक दमक की मुझे

रऊफ़ ख़ैर

कोई भी ज़ोर ख़रीदार पर नहीं चलता

रऊफ़ ख़ैर

मैं जंग जीत के जब्र-ओ-अना की हार गया

रासिख़ इरफ़ानी

किसी दराज़ में रखना कि ताक़ पर रखना

रासिख़ इरफ़ानी

शुऊर-ए-ज़ीस्त सही ए'तिबार करना भी

रशक खलीली

साक़ी-ए-रंगीं-अदा था बादा-ए-गुलफ़ाम था

रशीद शाहजहाँपुरी

साक़ी-ए-रंगीं-अदा था बादा-ए-गुलफ़ाम था

रशीद शाहजहाँपुरी

आँखों आँखों में मोहब्बत का पयाम आ ही गया

रशीद शाहजहाँपुरी

कुछ यूँ भी मुझे रास हैं तन्हाइयाँ अपनी

राशिद मुफ़्ती

दिल जिस से काँपता है वो साअत भी आएगी

राशिद मुफ़्ती

प्यारा सा ख़्वाब नींद को छू कर गुज़र गया

राशिद जमाल फ़ारूक़ी

इस तग-ओ-दौ ने आख़िरश मुझ को निढाल कर दिया

राशिद जमाल फ़ारूक़ी

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